हिंदुओं की एकता का प्रतीक कुंभ मेला

प्रस्तावना

कुंभ मेला हिंदुओं का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है! अधिकांश लोगों को कुंभ मेला क्या है, इसका आंतरिक स्वरूप, साधुओं के अखाड़े आदि के बारे में जानने की उत्सुकता होती है। इसी धार्मिक जिज्ञासा को ध्यान में रखते हुए यह लेख प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रयागराज में होने वाले कुंभ मेले में बिना किसी निमंत्रण या विज्ञापन, यात्रा में छूट और आर्थिक सहायता के करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। इसका मुख्य कारण है हिंदुओं की धर्मपरायणता। गंगा माता और पवित्र त्रिवेणी संगम पर आस्था के कारण हिंदू समाज साधु-संतों के साथ इतनी बड़ी संख्या में वहां एकत्र होता है। इससे हिंदू धर्म की अद्वितीयता समझ में आती है।

हिंदू धर्म के अंतरंग का दर्शन – कुंभ मेला – कुंभ मेला भारत की सांस्कृतिक महत्ता का केवल दर्शन ही नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक सम्मेलन है। कुंभ मेले का आध्यात्मिक महत्व और सांस्कृतिक महानता अत्यंत विशेष है। ‘हिंदू एकता’ ही कुंभ मेले का वैशिष्ट्य है। कुंभ मेले के माध्यम से हिंदुओं की धार्मिक और सांस्कृतिक अमरता का दर्शन होता है। यह मेला विदेशी नागरिकों को भी हिंदू धर्म के आंतरिक स्वरूप का परिचय कराता है।

देहरूपी कुंभ को रिक्त करने का अवसर- पाप, वासना और काम-क्रोध जैसे विकारों से भरे देहरूपी कुंभ को खाली करने का समय ही कुंभ मेला है। यह मानव के लिए आध्यात्मिक प्रगति का सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

हिंदुओं की सांस्कृतिक एकता का खुला मंच- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर-नासिक में होने वाले कुंभ मेलों के माध्यम से धर्मव्यवस्था ने हिंदू समाज को चार खुले मंच उपलब्ध कराए हैं। यह चार क्षेत्र चार दिशाओं का प्रतीक हैं। आधुनिक यातायात के साधन उपलब्ध होने से पहले भी ये कुंभ मेले आयोजित होते रहे हैं। उस समय भारत के चारों दिशाओं से एकत्र होना सरल नहीं था। फिर भी श्रद्धालु अपनी आस्था के कारण वहां आते थे। यही कारण है कि ये कुंभ मेले भारतीय एकता का प्रतीक और हिंदू संस्कृति में समानता का सूत्र बन गए।

इससे संबंधित एक महत्वपूर्ण घटना देखते हैं – सन् 1942 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने पं. मदनमोहन मालवीय जी के साथ प्रयागराज के कुंभ मेले को विमान से देखा। उन्होंने लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर आश्चर्यचकित होते हुए पं. मालवीय जी से पूछा, “इस कुंभ मेले में लोगों को सम्मिलित करने के लिए आयोजकों को कितने प्रयास और कितना खर्च करना पड़ा होगा?”
पं. मालवीय जी ने उत्तर दिया, “केवल दो पैसे!” यह सुनकर लिनलिथगो ने पूछा, “पंडित जी, क्या आप मजाक कर रहे हैं?”
पं. मालवीय जी ने अपनी जेब से पंचांग निकालकर उनके हाथ में देते हुए कहा, “इसकी कीमत केवल दो पैसे है। इससे ही लोगों को पता चलता है कि कुंभ पर्व का पवित्र समय कौन-सा है, और वे स्वतः उस समय स्नान के लिए उपस्थित हो जाते हैं। किसी को व्यक्तिगत निमंत्रण नहीं दिया जाता।”

गंगा स्नान का ध्येय – कुंभ मेले में लोग ‘कौन क्या पहन रहा है’, इस पर ध्यान नहीं देते। वहां न कोई भेदभाव होता है और न ही कोई अनुचित व्यवहार। सभी भक्त केवल ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं। गंगा में स्नान का ध्येय ही सभी का उद्देश्य होता है।

साधु-संतों की शाही शोभायात्रा और भक्तों की असीम भक्ति – अखाड़ों के साधुओं का पर्वकाल का स्नान ‘शाही स्नान’ कहलाता है। इसके लिए साधु-संतों की शस्त्रों के साथ शोभायात्रा निकलती है। सड़कों के दोनों ओर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। शोभायात्रा का मार्ग रंगोली और फूलों की पंखुड़ियों से सजाया जाता है। इसके बाद अखाड़े के साधु, महंत और उनके अनुयायी, हाथी, ऊंट, घोड़े आदि के साथ वाद्य यंत्रों की धुन पर पवित्र तीर्थ की ओर बढ़ते हैं। प्रातः चार बजे से ‘पवित्र स्नान’ शुरू होता है। इस समय नगाड़ों और ‘हर हर महादेव’, ‘जय गंगा मैया की’ जैसे जयघोष से वातावरण गूंज उठता है।

साधु-संतों के दर्शन का अनमोल अवसर – हिमालय की गुफाओं में ध्यान करने वाले सिद्ध पुरुष, कश्मीर से कन्याकुमारी तक पैदल यात्रा करने वाले परिव्राजक और अखाड़ों के साधु-महंतों का दर्शन कुंभ मेले में होता है।

श्रवण भक्ति को प्रोत्साहित करने वाला आयोजन – कुंभ मेले में संतों के प्रवचन और व्याख्यान भक्तों की श्रवण भक्ति को प्रोत्साहित करते हैं।

अहर्निश संचालित अन्नछत्र- हर अखाड़े में भक्तों के लिए अहर्निश अन्नछत्र चलाए जाते हैं। इनकी वजह से लाखों श्रद्धालुओं के भोजन की व्यवस्था हो जाती है।

उँच-नीच को भुलाने वाला भंडारा- कुंभ में अन्नछत्रों के माध्यम से भक्तों को समानता का अनुभव होता है। वहां भिखारी और अमीर, दोनों एक ही पंक्ति में ‘ प्रसाद’ ग्रहण करते हैं।

इस प्रकार, हिमालय से कन्याकुमारी तक विभिन्न स्थानों से आने वाले भक्त, साधु-संत और महंत, अपनी विविधता में एकता का दर्शन कराते हैं। इसलिए कुंभ मेला हिंदुओं की एकता का प्रतीक है।

इस वर्ष के महाकुंभ में विविध अखाडे, सनातन संस्था तथा हिन्दू जनजागृति समिति, महर्षी अध्यात्म विश्व विद्यालय आदि ने एकत्रित आकर हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन, हिन्दू एकता पदयात्रा का आयोजन किया। इसे श्रद्धालुओं ने भी बडे उत्साह से समर्थन देकर काल महात्म्य के अनुसार हिंदू एकता का दर्शन दिया।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘कुंभमेले का महत्त्व तथा पावित्र्यरक्षण’

संकलक: श्री. चेतन राजहंस
राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था

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