दीपावली: प्रकाश का पर्व, परंपरा और आधुनिक प्रासंगिकता

दीपावली: प्रकाश का पर्व, परंपरा और आधुनिक प्रासंगिकता

Abhishek Joshiअभिषेक जोशी,

मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया

अध्यक्ष, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना

दीपावली या दिवाली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और हर्षोल्लास से भरा पर्व है। कार्तिक मास की अमावस्या तिथि पर मनाया जाने वाला यह उत्सव अंधकार पर प्रकाश, अज्ञानता पर ज्ञान और असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाता है। इस पवित्र दिन दीयों की रोशनी से पूरा वातावरण जगमगा उठता है और यह मानव समाज को आशा, सकारात्मकता तथा नए जीवन की प्रेरणा देता है।

 

दीपावली मनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण पौराणिक और ऐतिहासिक कारण हैं। प्रमुख मान्यता के अनुसार, राक्षस राज रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीये जलाकर पूरे नगर को रोशन किया था। साथ ही, समुद्र मंथन के समय इसी दिन धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी के प्रकट होने की मान्यता है, इसीलिए घर-घर में लक्ष्मी पूजा की जाती है। द्वापर युग में श्रीकृष्ण द्वारा अत्याचारी असुर नरकासुर का वध कर लोगों को मुक्त कराने की खुशी में भी यह पर्व मनाया जाता है। अन्य धर्मों में भी इसका महत्व है, जैसे जैन धर्म में भगवान महावीर ने इसी दिन मोक्ष प्राप्त किया और शिख परंपरा में गुरु हरगोबिंद सिंह जी बंदीशाला से मुक्त हुए थे।

 

ओडिशा में दीपावली की एक विशिष्ट परंपरा और गहरा आध्यात्मिक पक्ष है। इस दिन को ओड़िया संस्कृति में पितृपुरुषों की स्मृति दिवस के रूप में श्रद्धा से मनाया जाता है। संध्या के समय परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर काउड़िया की जलती तीलियाँ ऊपर उठाते हैं और “बड़बड़ुआ हो, अंधेरे में आओ, उजाले में जाओ, बाईस पायों की सीढ़ियों पर गड़गड़ाते रहो” कहकर पुकारते हैं। यह पितृपुरुषों को प्रकाश का मार्ग दिखाने और परिवार के कल्याण के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का एक सुंदर माध्यम है। इसी रात राज्य के कई स्थानों पर माँ काली की पूजा भी बड़े धूमधाम से होती है।

दीपावली केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह मन के भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या जैसे अंधकार को दूर करके प्रेम और सद्भावना का प्रकाश जलाना सिखाती है। पारिवारिक स्तर पर यह रिश्तों को मधुर बनाती है; लोग एक-दूसरे को मिठाई और उपहार बाँटकर खुशियाँ साझा करते हैं। व्यापारियों के लिए यह नए वर्ष की शुरुआत होने के कारण बाज़ार में उत्साह बढ़ता है। साथ ही, घर-द्वार की सफाई से परिवेश में स्वच्छता और सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है।

 

आज के आधुनिक समाज में दीपावली की प्रासंगिकता बहुत अधिक है, क्योंकि यह व्यस्त जीवन में परिवार और समाज को एक साथ जोड़े रखने का अवसर देती है। लेकिन वर्तमान समय में अत्यधिक शोर और धुआँ पैदा करने वाले पटाखों के कारण वायु तथा ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है, जो बच्चों, बुजुर्गों और पशु-पक्षियों के लिए हानिकारक है। इसलिए आज के समय में ‘हरित दीपावली’ या प्रदूषण-मुक्त दीपावली मनाना अत्यंत आवश्यक है। मिट्टी के दीयों के उपयोग को प्राथमिकता देने से हमारे पारंपरिक कुम्हारों की आजीविका बढ़ेगी और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

 

वास्तव में दीपावली का मूल उद्देश्य प्रकाश और आनंद बाँटना है। अपने भीतर की सभी नकारात्मक भावनाओं को दूर करके, समाज के असहाय लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए प्रेम का एक दीया जलाना ही सच्ची दीपावली की सार्थकता है।

 

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