आपातकाल घोषित नहीं—फिर भी क्या लोकतंत्र अवरोध में है?
अभिषेक जोशी
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया,
मुख्य, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना
आज दिल्ली का दृश्य हमें एक बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करता है—संविधान के तहत आपातकाल घोषित न होने पर भी, यदि विरोध की आवाज़ को रोकने के लिए राजधानी को बैरिकेडों से घेर दिया जाए, यातायात बंद कर दिया जाए, इंटरनेट काट दिया जाए और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाए, तो इसे क्या कहा जाएगा? इसे कानूनी रूप से “आपातकाल” कहना उचित नहीं होगा; लेकिन यह सवाल उठाना ज़रूरी है कि क्या ऐसे कदम नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक विरोध के लिए उपलब्ध जगह को गंभीर रूप से सीमित कर रहे हैं।
आज, 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास बंद किए जाने, कुछ लंबी दूरी की ट्रेनें रद्द होने, प्रदर्शन स्थल के आसपास मोबाइल इंटरनेट सेवा निलंबित किए जाने और विभिन्न सड़कों पर बहुस्तरीय बैरिकेड लगाए जाने की खबरें आई हैं। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें भी हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और रेल सेवाएं पूरी तरह बंद न करने तथा यातायात को पूरी तरह ठप न करने के बारे में आगाह किया—ऐसी खबरें भी प्रकाशित हुई हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया जा सकता है। 1975 में इस अनुच्छेद के तहत आधार थे—युद्ध, बाहरी आक्रमण या “आंतरिक अशांति” (internal disturbance)। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल घोषित किया था। यह संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए हुआ था—लेकिन केवल संविधान के अनुसार घोषित होने से उसके बाद का हर इस्तेमाल लोकतांत्रिक या न्यायसंगत नहीं हो जाता।
1975–77 के आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित की गईं, राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार किया गया और पत्रकारिता पर सेंसरशिप लगाई गई। लेकिन इस इतिहास की शुरुआत केवल 1975 से नहीं होती। स्वतंत्रता के बाद अनुच्छेद 352 के तहत तीन बार आपातकाल घोषित किया गया—1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान, 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान और 1975 में “आंतरिक अशांति” के आधार पर। पहले दो आपातकाल बाहरी आक्रमण की परिस्थितियों में घोषित किए गए थे; 1975 का आपातकाल देश की आंतरिक राजनीतिक स्थिति को आधार बनाकर लगाया गया था।
आपातकाल के अनुभव के बाद 1978 के 44वें संविधान संशोधन ने अनुच्छेद 352 में “आंतरिक अशांति” की जगह “सशस्त्र विद्रोह” (armed rebellion) शब्द रखा। इसका उद्देश्य आपातकाल घोषित करने के आंतरिक आधार को अधिक स्पष्ट और सीमित करना था। इसके साथ ही, राष्ट्रपति के समक्ष आपातकाल की घोषणा के लिए मंत्रिमंडल का लिखित निर्णय और संसद की मंजूरी जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं भी की गईं।
इसलिए, आज के किसी प्रदर्शन, सड़क अवरोध या कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखकर यह कहना ठीक नहीं होगा कि सरकार अपनी मर्ज़ी से अनुच्छेद 352 लागू कर सकती है। इसी तरह, अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित न होने पर भी सरकार के हर कठोर कदम को कानूनी रूप से “आपातकाल” कहना सही नहीं है। लेकिन यह कानूनी अंतर नागरिकों के अधिकारों, शांतिपूर्ण विरोध और सरकारी कार्रवाई की आनुपातिकता पर सवाल उठाने के अधिकार को खत्म नहीं करता।
1975 के आपातकाल को “काला अध्याय” कहने के ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण हैं। उस दौरान गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक स्वतंत्रताओं पर चोट पहुंची—इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन उस इतिहास को आज की सरकारी कार्रवाइयों पर सवाल उठाने से बचने के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जो लोग 1975 के आपातकाल की निंदा करते हैं, उन्हें आज भी लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति उतनी ही सतर्कता दिखानी चाहिए।
सरकार कह सकती है कि ये कदम सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए हैं। भीड़ और हिंसा को रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन सवाल यह है: क्या ये कदम ज़रूरी थे? क्या उनका दायरा आवश्यकता से अधिक व्यापक था? निर्दोष यात्रियों, मरीजों, विद्यार्थियों, कामकाजी लोगों और प्रदर्शन में शामिल होने आए नागरिकों पर उनका कितना असर पड़ा? क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए उचित स्थान और सुरक्षा देने का कोई विकल्प मौजूद नहीं था?
लोकतंत्र में नागरिकों की असहमति राष्ट्र के लिए खतरा नहीं; यह लोकतंत्र के जीवंत होने का संकेत है। यदि किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन होता है, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए—लेकिन यदि विरोध की आवाज़ दबाने के लिए सड़क, रेल, मेट्रो और संचार व्यवस्था को सामूहिक रूप से बाधित किया जाता है, तो सरकार को उन कदमों का औचित्य स्पष्ट करना चाहिए।
आज की स्थिति को 1975 के संवैधानिक आपातकाल के समान बताना उचित नहीं होगा। फिर भी, जब राजधानी में प्रदर्शन के लिए जगह सीमित हो, यातायात और संचार प्रभावित हों तथा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाए, तब केवल यह कह देने से कि “यह आपातकाल नहीं है”, लोकतांत्रिक चिंताएं खत्म नहीं हो जातीं। नाम चाहे जो हो—मूल कसौटी यह है कि नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहे या नहीं, और राज्य की शक्ति का इस्तेमाल आवश्यकता की सीमा के भीतर हुआ या नहीं।
संविधान के तहत आपातकाल घोषित न होना इस बात का प्रमाण नहीं कि लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है। लोकतंत्र की सेहत इस बात से परखी जाती है कि सरकार अपने विरोध में उठने वाली आवाज़ों को कितना सहन करती है।

