फेफड़ों के पार: एक सिगरेट हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा को कैसे हानि पहुँचाती है

व्यसनों के विनाशकारी दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 26 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस’ मनाया जाता है। धूम्रपान के शारीरिक दुष्प्रभावों से सभी परिचित हैं, पर महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय (MAV) के एक रोचक अध्ययन ने हमारे स्वास्थ्य के एक पूरी तरह से अलग पहलू पर प्रकाश डाला है – “हमारी सूक्ष्म ऊर्जा”।

 

*प्रयोग: धूम्रपान का कुंडलिनी-चक्रों पर प्रभाव*

 

कुंडलिनी-चक्र हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कार्यों को सूक्ष्म ऊर्जा प्रदान करते हैं। धूम्रपान किसी व्यक्ति के कुंडलिनी-चक्रों पर क्या प्रभाव डालता है, इसका अध्ययन करने के लिए MAV के शोधकर्ताओं ने रूसी उपकरण ‘बायो-वेल’ और पारंपरिक लोलक (पेंडुलम) की मदद से एक प्रयोग किया। इसमें वर्षों से नियमित साधना कर रहे एक साधक को शामिल किया गया।

 

*धूम्रपान से पहले (मूल स्थिति) :* धूम्रपान करने से पहले साधक के कुंडलिनी-चक्र (सहस्रार, आज्ञा, मूलाधार) संतुलित थे (मध्यरेखा (सुषुम्ना नाड़ी) के समीप) अर्थात् ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण करने के लिए अनुकूल स्थिति में थे, नकारात्मक ऊर्जा शून्य थी और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल (Aura) 5.3 मीटर था।

उसके बाद उस प्रतिभागी साधक ने (अपनी सेवा के रूप में केवल शोध के लिए) सिगरेट के केवल आठ झुरके लिए। इससे तुरंत एक बड़ा परिवर्तन हुआ:

 

*तुरंत (0 मिनट):* सकारात्मक प्रभामंडल घटकर केवल 0.8 मीटर रह गया, जबकि नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल 7 मीटर तक फैल गया।

 

*20 मिनट बाद:* सकारात्मक ऊर्जा पूरी तरह शून्य हो गई और नकारात्मक ऊर्जा बढ़कर 15 मीटर से अधिक हो गई। सहस्रार और मणिपुर चक्रों ने नकारात्मक ऊर्जा ग्रहण कर ली, जिससे साधक की ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण और पाचन करने की क्षमता पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ा।

 

*30 मिनट बाद:* शरीर के भीतर प्रतिरोध शुरू हुआ, जिससे नकारात्मक ऊर्जा घटकर 12.5 मीटर हुई और सकारात्मक ऊर्जा (1 मीटर) का निर्माण होना शुरू हो गया।

 

*निष्कर्ष*

 

‘बायो-वेल’ और लोलक से किए गए अध्ययन के निष्कर्ष पूरी तरह से आपस में मेल खाते थे, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि सिगरेट के केवल ‘8 ‘झुरकों’ का नकारात्मक प्रभाव साधक के चक्रों और प्रभामंडल पर लगभग आधे घंटे तक रहा। यह (विरोध) साधक के कई वर्षों से नियमित साधना का परिणाम था। आम लोगों में यह प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है, जिससे उन पर धूम्रपान का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। बार-बार धूम्रपान करने से व्यक्ति के प्रभामंडल और चक्रों पर स्थायी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है; जिससे स्वास्थ्य तथा अन्य बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

निरंतर साधना से व्यक्ति अपने कुंडलिनी-चक्रों को सुदृढ़ कर सकता है और व्यसनों पर कम समय में काबू पा सकता है। यह प्रयोग तो केवल एक अंशमात्र है। MAV के पास ऐसे अनेक केस स्टडीज़ हैं जहाँ लोगों ने साधना के माध्यम से न्यूनतम प्रत्याहार लक्षणों (withdrawal symptoms) के साथ कम समय में व्यसनों पर मात की है।

 

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