आहे नीलो सइलो ओड़िआ जणाण गाकर पूज्य इंद्रेश जी महाराज ने भक्तों का दिल जीता : प्रथम दिन के महाराजजी के प्रवचन से – नन्द किशोर जोशी

आहे नीलो सइलो ओड़िआ जणाण गाकर पूज्य इंद्रेश जी महाराज ने भक्तों का दिल जीता : प्रथम दिन के महाराजजी के प्रवचन से –

नन्द किशोर जोशी

पुण्य स्थली सनसाईन फिल्ड में प्रथम दिन में ही छागये विश्वविख्यात श्रीमद्भागवत महापुराण कथा वाचक पूज्य इंद्रेश जी महाराज। उन्होंने बड़ी शुद्धता के साथ और ताल लय के साथ ओडिशा में सर्वाधिक लोकप्रिय जगन्नाथ महाप्रभु को समर्पित ओड़िआ भाषा में बोला आहे नील शइल, प्रबल मत्त बारण,

प्रबल मत्त बारण

मो आरत नलिनी वन कु कर दलन,

आहे नील शइल ॥

 

गजराज चिंता कला थाई घोर जलेन,

चक्र पेशि नाक नाशि उद्धरिल आपण,

आहे नील शइल ॥

 

घोर बने मृगुणी कु पड़िथिला कषण,

केड़े बड़ विपत्तिर करिअछ तारण,

आहे नील शइल ॥

 

कुरुसभा तले शुणि द्रौपदीर जणाण,

कोटि वस्त्र देई हेले लज्जाकल वारण,

आहे नील शइल ॥

 

रावण र भाई विभिषण गला शरण,

शरण सम्भालि ताकु लंके कल राजन,

आहे नील शइल ॥

 

प्रह्लाद पिता से जे बड़ दुष्ट दारुण,

स्तंम्भरू बाहारि ताकु विदारिल तक्षण,

 

प्रह्लाद पिता से जे बड़ दुष्ट दारुण,

स्तंम्भरू बाहारि ताकु विदारिल तक्षण,

आहे नील शइल ॥

 

कहे सालबेग हिन जाति रे मुं जवन,

श्रीरंगा चरण तले, श्रीरंगा चरण तल,

करु अक्षि जणाण ॥

 

आहे नील शइल, प्रबल मत्त बारण,

प्रबल मत्त बारण

मो आरत नलिनी वन कु कर दलनै,

आहे नील शइल ॥

वैसे तो भारत की समस्त भाषाओं की जननी है संस्कृत। लेकिन विद्वानों का मत है कि ओड़िआ भाषा संस्कृत से काफी निकट है।सारे विश्व में भगवान को रिझाने के लिए भजन गाये जाते हैं, लेकिन चूंकि ओडिशा भूमि जगन्नाथ भूमि है , यहां महाप्रभु को रिझाने,अपना दुखड़ा बयान करने के लिए,उससे भी बड़ा ताकतवर प्रयास किया जाता है, दर्द भरे लहजों में पुकार किया जाता है,उसी को कहते हैं जणाणो।

मैंने जगन्नाथ जी , जगन्नाथ मंदिर को समर्पित दो पुस्तकें हिंदी भाषा में लिखी है। उसमें एक पुस्तक में भक्त सालबेग ,उनके द्वारा गाया हुआ जणाणो पर विस्तार से चर्चा की है। महाप्रभु जगन्नाथ का रथ वापसी में,बाहुडा यात्रा समय, भक्त सालबेग से मिलने के लिए कैसे आतुर होते हैं,इसका जिक्र है।

उल्लेखनीय है कि भक्त सालबेग एक हिन्दू, ब्राह्मण महिला के कोख से जन्मे थे।भक्त सालबेग के पिता का नाम है लालबेग। सूबेदार लालबेग मुगलों के जमाने के पुलिस अधिकारी थे।वे एक बार पुरी जिले के किसी गांव से घोड़े पर सवार होकर कटक आ रहे थे।

लालबेग घोड़े पर सवार होकर कटक जब आरहे थे ,उस समय उनकी नजर एक तालाब में युवा महिला के नहाने पर गयी। महिला युवा थी, विधवा थी , सूबेदार लालबेग ने महिला को जबरदस्ती उठाकर घोड़े पर बैठाकर कटक लेकर आगये।

उन्हीं विधवा,ब्राहमणी महिला के पुत्र थे सालबेग।बेटे सालबेग को हिन्दू माता ने सनातनी संस्कार दिए। उन्हीं महान संस्कारों से सालबेग पले बढ़े।आगे जाकर भक्त सालबेग के नाम से विख्यात हुए। महाप्रभु जगन्नाथ के बड़े भक्त कहलाये।

अब मैं भक्त सालबेग की कटक जन्म भूमि के बारे में बता रहा हूं।यह भूमि है आज का शिशु भवन चिकित्सालय।शिशु भवन सनसाईन फिल्ड से मात्र आधे किलोमीटर की दूरी पर है। मुगलों के जमाने में इसे लालबाग कोठी कहा जाता था। तत्पश्चात अंग्रेजों के जमाने में यह गोवर्नर हाउस कहलाता था।

भुवनेश्वर राजधानी स्थानांतरित होने पश्चात , अनेक वर्षों पश्चात, यहां से गोवर्नर हाउस का स्थानांतरण पश्चात आज इस जगह बच्चों के इलाज हेतु सरकारी चिकित्सालय कार्यरत है। यहीं भक्त सालबेग जन्मे थे ।आज इस जगह का नाम है शिशु भवन। उपरोक्त शिशु भवन ओडिशा हाइकोर्ट से सटा हुआ है।

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