श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी में ‘वनकलागि’ पर विशेष चर्चा 

श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी में ‘वनकलागि’ पर विशेष चर्चा

नन्द किशोर जोशी

एक्जिक्यूटिव एडिटर

क्रांति ओडिशा मीडिया

 

मैंने जीवन में अभी तक 11 पुस्तकें लिखी हैं। इनमें दसवीं पुस्तक का नाम है जगत के नाथ जगन्नाथ,ग्यारहवीं पुस्तक का नाम है श्री जगन्नाथ मंदिर परिक्रमा। श्री जगन्नाथ मंदिर पर एवं श्री जगन्नाथ की महिमा पर दोनों पुस्तकों में विस्तार से वर्णन किया गया है।

 

श्री जगन्नाथ मंदिर में ठाकुरजी की अनेक -अनेक पूजा,पर्वौ पर विशेष पूजा इत्यादि होते रहते हैं साल भर। इनमें एक विशेष नीति है ,जिसका नाम है वनकलागि। पुरी में बाहर से आये असंख्य भक्तों को मालूम नहीं है,वनकलागि के बारे में।

 

इसी वनकलागि के बारे में मैं अब सभी जगन्नाथ भक्तों को विशेष जानकारी दे रहा हूं।वनकलागि नीति साधारणतया एक महीने में दो बार आयोजित होती है। साधारणतया यह वनकलागि नीति बुधवार को ही होती है।कभी एक्सपेशनल केस में गुरुवार को भी होती है।

 

कल बुधवार के दिन श्री जगन्नाथ मंदिर में वनकलागि नीति संपन्न हुई है। वनकलागि नीति कार्तिक महीने के पंचक में पांच दिन नहीं होती है। साधारणतया बुधवार को ही यह नीति होती है जैसे कल बुधवार को हुई है। अमावस्या, संक्रांति, पूर्णिमा, एकादशी, दुर्गा पूजा के समय नहीं होती है वनकलागि नीति।

 

वनकलागि नीति वाले दिन दूसरे भोग मंडप में भोग खत्म होने पर संध्या 6 से रात 10 बजे तक सर्व साधारण दर्शन बंद रहता है।यह एक गुप्त नीति होने के कारण नीति संपादन समय साधारण दर्शन बंद रहते हैं।

 

वनकलागि नीति में महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा के श्रीमुख का श्रंगार किया जाता है। परंपरागत रूप से दोपहर का धूप शेष होने पर मंदिर के सारे दरवाजे बंद कर यह गुप्त नीति संपन्न होती है।

 

दत्त महापात्र सेवक लोग ठाकुरों के श्रीमुख का श्रंगार करते हैं।इस नीति के आरंभ होने से खत्म होने में 4 घंटे का समय लगता है। तीनों दारु मूर्तियों के मुखमंडल श्रंगार को श्री जगन्नाथ मंदिर की भाषा में वनकलागि बोला जाता है।कल वनकलागि नीति के कारण संध्या 6 से रात 10 बजे तक सर्वसाधारण दर्शन बंद था।

 

आजकल की आधुनिक भाषा में हम इसे फेसियल भी कह सकते हैं।सारे दिन भर में करीब 8-10 बार गर्म,गर्म प्रसाद ठाकुरजी को अर्पण किया जाता है। इनमें विभिन्न तरह तरह के प्रसाद शामिल हैं।इन प्रसादों की गर्माहट से ,उसकी वाष्प से ठाकुरजी के मुखमंडल की उज्जवलता में थोड़ी कमी आ जाती है। वनकलागि माध्यम से उज्जवलता बहाली हो जाती है। ठाकुरजी का मुखमंडल फिर से चमक उठता है।जय जगन्नाथ।

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