सनातन के ग्रंथ-लघुग्रंथों की 1 करोड़ से अधिक प्रतियां प्रकाशित

‘सच्चिदानन्द परब्रह्म डॉ. आठवले (गुरुदेव) जैसी महान विभूति की सिद्धहस्त लेखनी से साकार हुए सनातन के ग्रंथ यानी चैतन्यमय ज्ञान का भंडार हैं! कई संत धर्म और अध्यात्म से संबंधित ग्रंथ लिखते हैं; लेकिन धर्म और अध्यात्म के साथ-साथ राष्ट्र रक्षा, हिंदू राष्ट्र की स्थापना, भाषा शुद्धि, सात्त्विक कला जैसे विविध विषयों पर ग्रंथ लिखने वाले वर्तमान कलियुग में सच्चिदानन्द परब्रह्म डॉ. आठवले संभवतः एकमात्र संत होंगे! उनकी अथक लगन के कारण अप्रैल 2026 तक सनातन के 370 ग्रंथों और लघुग्रंथों की 13 भाषाओं में 1 करोड़ 2 लाख 67 हजार प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं!

सनातन के ग्रंथों द्वारा 1 करोड़ का आंकड़ा पार करना, सनातन के ग्रंथ-कार्य के लिए एक गौरवशाली घटना है! प्रकाशित प्रतियों की इस संख्या से यह पता चलता है कि ‘समाज के जिज्ञासुओं में अध्यात्म और शास्त्र को समझने की कितनी रुचि है’।

 

*1. गुरुदेव की चिकित्सीय लेखन से आध्यात्मिक ग्रंथों तक की यात्रा!*

गुरुदेव ने अपने ग्रंथ लेखन का श्रीगणेश चिकित्सा क्षेत्र से किया। अपने भाई डॉ. वसंत आठवले से प्रेरणा लेकर उन्होंने ‘साइंस ऑफ हिप्नोसिस’ (सम्मोहन विज्ञान) और ‘हिप्नोथेरेपी’ (सम्मोहन चिकित्सा) जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें एहसास हुआ कि भौतिक बीमारियों का इलाज करने की तुलना में ‘अध्यात्मशास्त्र’ श्रेष्ठ है। इसीलिए 1987 में उन्होंने ‘अध्यात्मशास्त्र’ नाम का अपना पहला ग्रंथ लिखा। समय के साथ, साधना के बारे में केवल सैद्धांतिक जानकारी देने के बजाय, उन्होंने ‘साधना कैसे करें’, इस व्यावहारिक (कृति के) स्तर के मार्गदर्शन पर अधिक बल दिया।

‘तू किताबों के ऊपर किताबें लिखेगा’ यह गुरु आशीर्वाद!

गुरु प.पू. भक्तराज महाराज द्वारा दिए गए ‘तू किताबों के ऊपर किताबें लिखेगा’ इस आशीर्वाद को शिरोधार्य (सर्वोच्च) मानकर उन्होंने ग्रंथ लेखन किया। ये ग्रंथ लोहे को सोना बनाने वाले पारस पत्थर की तरह हैं; क्योंकि इन ग्रंथों की सीख को आचरण में लाने से कई लोगों के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आए हैं।

*अध्यात्मशास्त्र के इतिहास में दुर्लभ उदाहरण!*

अन्य संतों की तरह केवल प्रवचन या कीर्तन न करते हुए, गुरुदेव ने ग्रंथ लेखन के माध्यम से समाज को ‘साधना’ का मार्ग दिया। इसका प्रमाण यह है कि 1.5.2026 तक सनातन संस्था के 134 साधक संत बन चुके हैं, जबकि 1025 साधकों की संतत्व की दिशा में यात्रा जारी है। ग्रंथों का अध्ययन करके इतनी तीव्र गति से संतों का निर्माण होना, अध्यात्मशास्त्र के इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण है।

 

*सनातन की ग्रंथ संपदा की अद्वितीय विशेषताएं!*

 

*विविध विषय:* केवल अध्यात्म ही नहीं, बल्कि आचारधर्म, बालसंस्कार, राष्ट्र रक्षा, सात्त्विक कला, आपातकालीन उपचार और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा जैसे विभिन्न विषयों पर यह ग्रंथ संपदा उपलब्ध है।

*सरल भाषा:* क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग न करते हुए, आम लोगों को समझ में आने वाली सरल भाषा में यह ज्ञान प्रस्तुत किया गया है।

*व्याकरण की शुद्धता:* विशेष रूप से, व्याकरण की दृष्टि से ये ग्रंथ अत्यंत शुद्ध हैं। ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ नामक वैज्ञानिक उपकरण द्वारा किए गए शोध से यह सिद्ध हुआ है कि व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध लेखन में सकारात्मक ऊर्जा अधिक होती है।

*वैज्ञानिक दृष्टिकोण:* ग्रंथों में आज की वैज्ञानिक पीढ़ी को स्वीकार्य हो, इस प्रकार सारणी (टेबल्स), प्रतिशत और वैज्ञानिक उपकरणों के आधार पर अध्यात्मशास्त्र को प्रस्तुत किया गया है।

*दिव्य ज्ञान:* ग्रंथों का 20 प्रतिशत ज्ञान पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध नहीं है। यह ज्ञान बुद्धि से नहीं, बल्कि ईश्वरीय प्रेरणा से प्रस्फुटित हुआ है।

सनातन द्वारा निर्मित ग्रंथ संपदा का भाषानुसार विस्तार!

यह दिव्य ज्ञान केवल एक भाषा तक सीमित न रहे, बल्कि विभिन्न प्रांतों के जिज्ञासुओं तक पहुंचे, इसके लिए सनातन ने दिन-रात प्रयास किए हैं। मार्च 2026 तक सनातन ने 13 भाषाओं में अपना ज्ञान भंडार खोल दिया है। इसमें सर्वाधिक 348 ग्रंथ मराठी भाषा में हैं, इसके बाद अंग्रेजी भाषा में 202, तथा कन्नड़ और हिंदी भाषाओं में प्रत्येक के 201ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। इसके साथ ही गुजराती भाषा में 70, तेलुगु में 54, तमिल में 49, बंगाली में 30, मलयालम में 25, ओडिया में 22, पंजाबी में 13, नेपाली में 3और असमिया भाषा में 2 ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। इस प्रकार कुल 370 ग्रंथों के माध्यम से अध्यात्म का यह चैतन्यमय प्रवाह पूरे भारत में प्रवाहित हो रहा है।

 

*ग्रंथों के मुख्य विषय :*

 

*हिंदू धर्म:* त्योहार, उत्सव, 16 संस्कार और परंपराएं।

*आचारधर्म:* आदर्श आहार, निद्रा, वेशभूषा और आभूषण।

*साधना:* नामजप, स्वभावदोष उन्मूलन, अहं-उन्मूलन और भावजागृति।

*आपातकालीन उपाय:* आयुर्वेदिक उपचार, नामजप और प्राथमिक चिकित्सा।

आपातकाल में मार्गदर्शक सिद्ध होने वाले ग्रंथ!

प्राचीन काल के ऋषियों ने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि धर्मग्रंथों के माध्यम से प्रचुर मात्रा में लेखन करके रखा है। इन धर्मग्रंथों में से वर्तमान समय के लिए आवश्यक विषयों और लेखन को सनातन के ग्रंथों में समाहित किया जाता है। आने वाला समय आपातकाल (संकट का समय) का है। ऐसे समय में ये ग्रंथ ही मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। हर किसी को अपने घर में इन ‘चैतन्यमय ग्रंथों’ का संग्रह रखना चाहिए और उनके अनुसार आचरण करना चाहिए, यही सच्ची गुरुसेवा होगी!

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