मनुष्य की असली ऊँचाई उसके कद में नहीं, उसके व्यवहार में दिखाई देती है। पर्वत जितना ऊँचा होता है, उतना ही स्थिर और मौन भी; वृक्ष जितना फलता है, उतना ही झुकता जाता है। लेकिन मनुष्य की एक ऊँचाई ऐसी भी होती है, जहाँ पहुँचकर वह धरती से अपना संबंध भूलने लगता है। वहीं से गरिमा का उजास धीरे-धीरे दर्प की छाया में बदलने लगता है।
अभिमान और स्वाभिमान सुनने में लगभग एक जैसे लगते हैं, पर उनकी दिशाएँ अलग हैं। एक अपने होने को दूसरों से बड़ा साबित करने की चाह है, दूसरा अपने होने के मूल्य को पहचानने की शांत चेतना। एक बाहर प्रमाण खोजता है, दूसरा भीतर विश्वास।
अभिमान तब जन्म लेता है, जब उपलब्धियाँ, पद, धन, ज्ञान, सौंदर्य या प्रतिष्ठा व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण लगने लगते हैं। जाने-अनजाने में तुलना उसकी दृष्टि पर हावी हो जाती है। उसे अपने होने का सुख कम और दूसरों से आगे होने का सुख अधिक दिखाई देता है। धीरे-धीरे यही भाव आत्ममुग्धता और अहंकार में बदल जाता है और व्यक्ति अपने ही बनाए ऊँचे आसन पर अकेला बैठ जाता है।
इसके विपरीत, आत्मगरिमा व्यक्ति को यह विश्वास देती है कि उसका अस्तित्व भी सम्मान के योग्य है। वह न स्वयं को किसी से कमतर समझता है, न किसी को अपने से छोटा। अपनी सीमाओं और मूल्यों की रक्षा करते हुए भी वह दूसरे की गरिमा का सम्मान करता है।
अभिमान कहता है-
“मैं तुमसे बेहतर हूँ।”
स्वाभिमान कहता है-
“मैं किसी से कम नहीं हूँ।”
यही दोनों के बीच की सबसे महीन और निर्णायक रेखा है। कबीर का प्रसिद्ध दोहा इस अंतर को बड़ी सहजता से सामने रखता है-
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥”
ऊँचा होना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। ऊँचाई तब सार्थक होती है, जब उससे किसी को छाया मिले, किसी को सहारा मिले, किसी के जीवन में थोड़ी-सी राहत या रोशनी उतर सके। केवल कद बढ़ जाना पर्याप्त नहीं, उपयोगी होना अधिक महत्वपूर्ण है।
जिसे अपनी श्रेष्ठता की निरंतर पुष्टि चाहिए, वह आलोचना से असहज होता है। अपनी कमियाँ स्वीकार करना उसके लिए कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, भीतर से स्थिर व्यक्ति अपनी भूल मान लेने को छोटा होना नहीं समझता। वह जानता है कि स्वयं को सुधारने का साहस ही वास्तविक विकास की पहली सीढ़ी है।
इसीलिए आत्मसम्मान को ज़िद या अकड़ समझ लेना भी भूल है। हर बात पर अड़ जाना दृढ़ता नहीं होती। कहीं संबंध बचाने के लिए झुकना परिपक्वता है और कहीं अपनी गरिमा बचाने के लिए अडिग रहना आवश्यक। विवेक यह पहचानता है कि मौन कब विनम्रता है और दृढ़ता कब आत्मरक्षा।
रिश्तों में भी यही अंतर दिखाई देता है। जब “मैं” इतना बड़ा हो जाए कि “हम” के लिए जगह न बचे, तो संबंधों में दीवारें खड़ी होने लगती हैं। स्वस्थ आत्मसम्मान इसके विपरीत सीमाएँ तय करता है। वह प्रेम करना सिखाता है, लेकिन स्वयं को मिटा देना नहीं। समझौता करना सिखाता है, लेकिन अपने मूल्यों को गिरवी रखना नहीं।
पद बदलते हैं, धन घटता-बढ़ता है, सौंदर्य समय के साथ ढलता है और प्रसिद्धि भी स्थायी नहीं होती। जो आज शिखर पर है, कल स्मृति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन सत्य, चरित्र, संवेदना और अपने अस्तित्व की गरिमा- ये वे आधार हैं, जो समय के साथ और गहरे होते जाते हैं।
दर्प को दूसरों की आँखों में अपनी ऊँचाई चाहिए, जबकि आत्मगरिमा को अपने अंतर्मन में अपनी सच्चाई।
दर्प को प्रमाण चाहिए, आत्मसम्मान को विश्वास।
दर्प कहता है-
“देखो, मैं क्या हूँ।”
भीतर की गरिमा मौन रहती है-
“मैं जानती हूँ कि मैं कौन हूँ।”
शायद जीवन की परिपक्वता इसी संतुलन को साध लेने में है। अपनी उपलब्धियों पर प्रसन्न रहें पर उन्हें श्रेष्ठता का प्रमाण न बनने दें। अपनी गरिमा पहचानें पर किसी दूसरे की गरिमा कम न करें। मनुष्य की वास्तविक शक्ति केवल आगे बढ़ने में नहीं, यह जानने में भी है कि कहाँ रुकना है, कहाँ झुकना है और कहाँ अपने मूल्यों पर अडिग रहना है।
दीपक और दावानल दोनों में अग्नि होती है, पर उनका स्वभाव अलग-अलग होता है। दीपक स्वयं जलकर चारों ओर प्रकाश बाँटता है, जबकि दावानल अपनी लपटों में सब कुछ निगल लेना चाहता है। स्वाभिमान दीपक की लौ है- संयत, उजली और आत्मप्रकाशित। अभिमान दावानल की तरह है, जिसे अपने विस्तार के लिए दूसरों को जलाना पड़ता है।
अपने जीवन की ओर देखती हूँ तो पाती हूँ कि मैंने आत्मसम्मान को हमेशा अपने अस्तित्व की सहज आवश्यकता की तरह जिया है। अपनी बात कहने का अधिकार, अपने निर्णयों पर विश्वास और अपनी खुद्दारी से समझौता न करने की वृत्ति मेरे लिए कभी किसी को छोटा दिखाने का माध्यम नहीं रही। फिर भी कई बार यही दृढ़ता दूसरों को दर्प या अहंकार दिखाई दी। शायद इसलिए कि जो व्यक्ति हर बात पर सहमति नहीं देता, हर अनुचित व्यवहार को चुपचाप स्वीकार नहीं करता और आवश्यकता पड़ने पर ‘न’ कहने का साहस रखता है, उसे समझना हमेशा आसान नहीं होता।
मैं एक कलमकार हूँ। शायद इसीलिए मेरे लिए आत्मसम्मान केवल एक विचार नहीं, जीवन का सहज संस्कार है। मेरी कलम ने हमेशा वही लिखने का प्रयास किया है, जो मेरे हृदय ने महसूस किया और मेरी अंतरात्मा ने स्वीकारा। शब्द मेरे लिए किसी को ऊँचा या नीचा दिखाने का माध्यम नहीं, भीतर के सत्य को अभिव्यक्ति देने का दायित्व हैं। दुनिया की आवाज़ों में भ्रम हो सकता है, धारणाएँ अलग हो सकती हैं पर अंतरात्मा की आवाज़ से बड़ा कोई साक्षी नहीं।
संभव है, मेरी स्पष्टता कभी किसी को कठोर लगी हो, मेरी चुप्पी को अकड़ समझा गया हो और अपने सत्य पर टिके रहना किसी को अहंकार दिखाई दिया हो। लेकिन हर व्यक्ति हमें उसी दृष्टि से नहीं देख सकता, जिस दृष्टि से हम स्वयं को जानते हैं। दूसरों की धारणा को बदलना हमारे हाथ में नहीं, पर अपनी नीयत और आचरण को निर्मल रखना अवश्य हमारे हाथ में है।
अंततः मनुष्य की पहचान इस बात से नहीं बनती कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं बल्कि इससे कि वह अकेले में अपने आप से आँख मिलाकर कितना सहज रह सकता है। यदि रीढ़ को सीधा रखने वाली शक्ति और हृदय को कोमल बनाए रखने वाली विनम्रता दोनों साथ चलें, तभी व्यक्तित्व में संतुलन आता है।
मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात से नहीं आँकी जाएगी कि वह कितनों से आगे निकल गया अपितु इससे कि उसके आगे बढ़ने से कितनों के लिए राह आसान हुई। जो स्वयं प्रकाशमान हो और जिसकी रोशनी से किसी और का दीप भी जल उठे, वही ऊँचाई सार्थक है।
और शायद जीवन का मेरा अपना निष्कर्ष भी यही है-
“मैं किसी से ऊपर होने की आकांक्षा नहीं रखती
बस अपने सत्य से नीचे गिरना स्वीकार नहीं करती
यही मेरे स्वाभिमान की पहचान है।”
पुष्पा सिंघी, कटक

