धनतेरस (धनत्रयोदशी) : आरोग्य, समृद्धि और धर्माचरण का मंगलपर्व !

शक संवत के अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को ‘धनत्रयोदशी’ कहते हैं। इसे सामान्य बोलचाल में ‘धनतेरस’ कहा जाता है। दीपावली पर्व का शुभारंभ करनेवाले इस त्योहार का धार्मिक, आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष महत्त्व है। भगवान धन्वंतरि की उपासना, माता लक्ष्मी एवं भगवान कुबेर का पूजन तथा यमदीपदान इस पर्व के प्रमुख अंग हैं।

*1. भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य दिवस*
पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वंतरि अमृतकलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन को उनके प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक तथा देवताओं का वैद्य माना जाता है। वे आरोग्य एवं दीर्घायु के प्रतीक हैं। इसलिए इस दिन उनकी उपासना कर निरोगी जीवन की प्रार्थना की जाती है।

इस अवसर पर हमें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संकल्प भी लेना चाहिए। नियमित दिनचर्या, संतुलित एवं सात्त्विक आहार, योग-व्यायाम और पर्याप्त नींद स्वस्थ जीवन के आधार हैं। इस दिन नीम की पत्तियों को पीसकर उनमें शक्कर मिलाकर प्रसाद वितरित करने की भी परंपरा है। नीम के औषधीय गुणों के कारण इसे स्वास्थ्यवर्धक माना गया है।

*2. माता लक्ष्मी एवं भगवान कुबेर का पूजन*
धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। माता लक्ष्मी धन एवं समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं, जबकि भगवान कुबेर धन के संरक्षक माने जाते हैं। इस दिन व्यापारी अपनी तिजोरी और नए वर्ष के हिसाब-किताब की बहियों का पूजन करते हैं।
भारतीय संस्कृति में धन को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का साधन नहीं, अपितु धर्माचरण एवं परोपकार का माध्यम माना गया है। धर्मसम्मत मार्ग से अर्जित धन का उपयोग परिवार, जरूरतमंदों, धार्मिक कार्यों एवं समाजहित के लिए करना ही उसका वास्तविक सदुपयोग है।

*3. सोना-चांदी एवं नए बर्तन खरीदने की परंपरा*
धनतेरस के दिन सोना, चांदी, आभूषण, धातु के बर्तन एवं अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन शुभ वस्तुओं की खरीदारी से घर में सुख-समृद्धि आती है। हालांकि, खरीदारी करना अनिवार्य नहीं है। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आवश्यक वस्तुएं खरीदनी चाहिए तथा अनावश्यक खर्च और दिखावे से बचना चाहिए।

*4. यमदीपदान का विशेष महत्त्व*
धनतेरस की संध्या को यमराज के निमित्त दक्षिण दिशा में दीपदान करने की परंपरा है। इसे ‘यमदीपदान’ कहते हैं। मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की दीर्घायु के लिए यमदेव से प्रार्थना की जाती है।
इससे संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। उनकी पत्नी ने पति की रक्षा के लिए घर के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषण और दीपों का ढेर लगा दिया तथा पूरी रात जागकर गीत गाती रही। जब यमराज सर्प के रूप में वहां पहुंचे, तब दीपों के प्रकाश और आभूषणों की चमक से वे भीतर प्रवेश नहीं कर सके। इस प्रकार राजकुमार के प्राण बच गए। इसी कथा से यमदीपदान की परंपरा जुड़ी है।

*5. स्वच्छता एवं सात्त्विकता का महत्त्व*
धनतेरस पर घर की सफाई, पूजा-स्थल की शुद्धता और दीप प्रज्वलित करने का विशेष महत्त्व है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में बाहरी स्वच्छता के साथ आंतरिक शुद्धता पर भी बल दिया गया है। इसलिए क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार जैसे मनोविकारों को दूर कर मन को सात्त्विक बनाने का प्रयास करना चाहिए।

*6. धनतेरस का वास्तविक संदेश*
धनतेरस का पर्व केवल खरीदारी और भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं है। भगवान धन्वंतरि की उपासना हमें आरोग्य का महत्त्व सिखाती है, माता लक्ष्मी एवं भगवान कुबेर का पूजन धर्मसम्मत समृद्धि की प्रेरणा देता है और यमदीपदान जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव जागृत करता है।
इसलिए इस धनतेरस पर केवल धन-संपत्ति बढ़ाने का ही नहीं, अपितु सद्गुण, भक्ति, साधना और परोपकार की संपदा बढ़ाने का भी संकल्प लें। धन का उपयोग धर्मकार्य एवं समाजसेवा के लिए करें तथा अपने घर के साथ मन को भी स्वच्छ एवं सात्त्विक बनाएं।
वास्तव में, जिस घर में आरोग्य, सद्भाव, धर्माचरण, भक्ति और संतोष का वास होता है, वही घर सच्चे अर्थों में समृद्ध होता है।

आइए, इस धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी एवं भगवान कुबेर से प्रार्थना करें कि सभी को उत्तम स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, धर्मसम्मत समृद्धि और ईश्वरभक्ति प्राप्त हो !

 

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