‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘हे भगवान! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए’, यह प्रार्थना भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक दृष्टि को व्यक्त करती है। प्रत्येक जीव का स्वाभाविक प्रयास अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर प्रगति करने का होता है। जीवन में नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर तथा अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का संदेश देने वाला पर्व है दीपावली! यह केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, अपितु जीवन को सकारात्मकता, आनंद और आध्यात्मिकता से आलोकित करने का अवसर है।
*सत्य की विजय का प्रतीक है दीपावली!*
मान्यता है कि प्रभु श्रीरामचंद्रजी 14 वर्षों का वनवास पूर्ण कर दीपावली के दिन अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन से अयोध्यावासियों में अपार आनंद छा गया। प्रभु श्रीराम के स्वागत में संपूर्ण अयोध्या नगरी के घर-घर में घी के दीप प्रज्वलित किए गए। प्रभु श्रीराम सत्य और धर्म के प्रतीक हैं। अतः उनका विजयपूर्वक अयोध्या लौटना सत्य और धर्म की विजय का प्रतीक बना। इसी विजय के उत्सव के रूप में दीपावली को दीपोत्सव एवं प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
*सकारात्मकता और आनंद बढ़ाने वाला पर्व!*
दीपावली के आगमन से पूर्व घरों, दुकानों, प्रतिष्ठानों तथा आसपास के परिसर की स्वच्छता की जाती है। घरों के जाले हटाए जाते हैं, रंगाई-पुताई होती है तथा टूटे-फूटे सामान की मरम्मत की जाती है। इस प्रकार स्वच्छता के साथ ही वातावरण में प्रसन्नता और सकारात्मकता का संचार होता है। स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित वातावरण का प्रभाव हमारे मन और बुद्धि पर भी पड़ता है। इससे मन की नकारात्मकता दूर होकर प्रसन्नता एवं उत्साह में वृद्धि होती है।
*लक्ष्मीपूजन का वास्तविक उद्देश्य : सद्गुणों की वृद्धि और धर्माचरण!*
अश्विन अमावस्या को सायंकाल लक्ष्मीपूजन किया जाता है। इसके उपरांत रात्रि में अलक्ष्मी निःसारण की परंपरा भी प्रचलित है। शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मीपूजन से उपासक को लक्ष्मीतत्त्व का लाभ प्राप्त होता है। इस लाभ को स्थायी बनाए रखने के लिए धर्माचरण करना आवश्यक है।
अधर्म का साथ देने अथवा मन में कर्तापन का भाव उत्पन्न होने से आध्यात्मिक उन्नति में बाधा आती है। सामान्यतः कहा जाता है कि ‘लक्ष्मी चंचल होती हैं’; परंतु वास्तव में लक्ष्मी चंचल नहीं, अपितु वे भगवान के अनुसंधान में स्थिर रहती हैं। जहां ईश्वर का अनुसंधान और धर्माचरण होता है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है।
ऐश्वर्य, सौंदर्य, शांति, सत्य, समृद्धि एवं संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी श्री महालक्ष्मी कमलासन पर विराजमान हैं। जिस प्रकार कमल कीचड़ में रहकर भी उससे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार हमें भी अपने स्वभावदोषों एवं अहंकाररूपी कीचड़ को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। वर्ष में केवल एक बार लक्ष्मीपूजन करने से देवी की कृपा प्राप्त नहीं होती; इसके लिए निरंतर धर्माचरण एवं ईश्वर का अनुसंधान आवश्यक है। अपने दुर्गुणों को दूर कर सद्गुणों की वृद्धि करना ही वास्तविक अर्थों में अलक्ष्मी निःसारण है। ऐसा आचरण करने से हमारे हृदय में श्री लक्ष्मी का स्थायी वास होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
*आधुनिकता की चकाचौंध में बदलता दीपावली का स्वरूप!*
दीपावली समृद्धि, आनंद और प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व है; परंतु वर्तमान में इसका पारंपरिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। देवताओं एवं महापुरुषों के चित्रों वाले पटाखे फोड़ना, फिल्मी गानों के साथ दीपावली मनाना, आंखों के लिए कष्टदायक एवं स्वास्थ्य तथा पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक चीनी विद्युत् मालाओं और आकाशदीपों का उपयोग करना जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। इनसे दीपावली के मूल आध्यात्मिक भाव को ठेस पहुंचती है।
जिस देवी की हम घर में श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उन्हीं के चित्रों वाले पटाखे फोड़कर उनके चित्रों को चिथड़े-चिथड़े करना क्या उचित है? क्या ऐसी कृतियों से देवी प्रसन्न होंगी? घर में की गई पूजा के पश्चात यदि हम स्वयं ही देवताओं का अनादर करने वाली कृतियां करते हैं, तो पूजा का वास्तविक फल कैसे प्राप्त होगा? हमें यह भी विचार करना चाहिए कि ऐसी अनुचित कृतियों से हम भावी पीढ़ी के सामने कौन-सा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।
आज स्वदेशी एवं पारंपरिक वस्तुओं की अपेक्षा विदेशी उत्पादों और दिखावे की चकाचौंध के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। यह स्थिति बदलना आवश्यक है। दीपावली का वास्तविक आनंद तभी प्राप्त होगा, जब हम उसके आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखेंगे।
*आइए, आदर्श दीपावली मनाने का संकल्प लें!*
दीपावली को आदर्श रूप में मनाने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। यदि बाजार में देवताओं एवं महापुरुषों के चित्रों वाले पटाखे बेचे जा रहे हों, तो हिंदुओं को संगठित होकर दुकानदारों एवं नागरिकों का प्रबोधन करना चाहिए। अपने संपर्क में आने वाले बच्चों और युवाओं को भी इस विषय में जागरूक करना चाहिए।
दीपावली के अवसर पर अशास्त्रीय एवं अश्लील गीतों के स्थान पर भक्ति, भाव और देशप्रेम जागृत करने वाले गीतों को प्राथमिकता देनी चाहिए। भावी पीढ़ी के कौशल विकास तथा उनमें हिंदू धर्म, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति प्रेम एवं कृतज्ञताभाव जागृत करने के लिए रंगोली प्रतियोगिता, परिसर स्वच्छता एवं सजावट जैसी रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए।
शरीर एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक विदेशी और चीनी उत्पादों के स्थान पर स्वदेशी तथा हलाल-मुक्त उत्पादों को प्राथमिकता देने का संकल्प लेना चाहिए। केवल विचारों तक सीमित न रहकर स्वयं इन बातों का आचरण करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें।
ऐसी आदर्श दीपावली ही हमें ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय’ अर्थात् मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने का मार्ग दिखाती है। इससे हमारा जीवन अमृत के समान आनंदमय बन सकता है।
आइए, इस दीपावली पर अपने कुलदेवता का स्मरण कर उनसे प्रार्थना करें—
‘हे भगवान! आप ही हमसे इस वर्ष आदर्श दीपावली मनवा लीजिए। हमारी व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा और उन्नति के लिए भी हमसे धर्माचरण करवा लीजिए। हमारे मन में सद्गुणों की वृद्धि कर हमें आपके अनुसंधान में रहने की प्रेरणा दीजिए। यही आपके श्रीचरणों में प्रार्थना है!’

