ऐतिहासिक नगरी कटक की शारदीय दुर्गापूजा: इतिहास, चाँदी के मेढ़ और महाविसर्जन की अनोखी गाथा
अभिषेक जोशी
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
अध्यक्ष, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना
हजारों वर्षों की विरासत संजोए “सिल्वर सिटी” अर्थात चाँदी के शहर कटक की दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भाईचारे, उत्कृष्ट कला, इतिहास और सामाजिक सद्भावना का एक महामिलन है। शरद ऋतु के आगमन के साथ महानदी और काठजोड़ी के तटवर्ती यह शहर देवी-आराधना के उल्लास में झूम उठता है। कटक पूजा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, चाँदी के मेढ़ की कलात्मक विशेषता और भसानी शोभायात्रा के अपूर्व दृश्य ने पूरे भारतवर्ष में इसकी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।
कटक में सार्वजनिक दुर्गापूजा की शुरुआत इतिहास को सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ से जोड़ा जाता है। इतिहास और जनश्रुति के अनुसार, लगभग 1510 से 1514 ईस्वी के बीच वैष्णव धर्म के प्रचारक श्री चैतन्य महाप्रभु बंगाल से पुरी यात्रा करते समय कुछ दिन कटक में रुके थे। महाप्रभु चैतन्य कटक के बालुबाजार के निकट स्थित बिनोद बिहारी मंदिर परिसर में रहे थे। उस समय आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि पड़ी थी, इसलिए वहाँ देवी महिषासुरमर्दिनी की पूजा आरंभ की गई। यह परंपरा आगे चलकर बालुबाजार पूजा कमिटी के रूप में प्रसिद्ध हुई, जो आज भी कटक का सबसे प्राचीन दुर्गापूजा पंडाल माना जाता है। श्री चैतन्य एक परम वैष्णव होते हुए भी शक्ति-साधना के इस महापर्व को अपने आँचल में ले आए; यह उत्कलीय संस्कृति में वैष्णव और शाक्त धर्म के अद्भुत समन्वय का ज्वलंत उदाहरण है। बालुबाजार में आज भी प्राचीन तालपत्र पोथी और तांत्रिक विधान के अनुसार पूजा-अर्चना की जाती है।
कटक की पूजा किसी एक विशेष समुदाय का पर्व नहीं है। यह शहर की “बाउन बाजार, तेपन गली” की एकता को प्रतिबिंबित करती है। यहाँ प्रत्येक साही अपने-अपने पंडाल में माँ की प्रतिष्ठा करता है। कटक की सामाजिक बनावट ऐसी है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय मिलकर पूजा पंडाल निर्माण, आलोक सज्जा और सेवा-कार्यों में भाग लेते हैं। अनेक पंडालों में गैर-हिंदू भाई भी पूजा समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में जिम्मेदारी निभाते हैं, जो कटक की भाईचारे की संस्कृति की मजबूत पहचान है।
कटक को “रूपार सहर” या “सिल्वर सिटी” कहे जाने का मुख्य कारण इसकी विश्वप्रसिद्ध तारकसी (Silver Filigree) कारीगरी है। यह कला दुर्गापूजा में “चाँदी के मेढ़” के रूप में देवी की पृष्ठभूमि को सजाती है। 1956–57 में चौधरी बाजार पूजा कमिटी ने पहली बार शुद्ध चाँदी से एक भव्य मेढ़ का निर्माण कर इतिहास रचा था। लगभग 35 वर्षों तक चौधरी बाजार ही कटक का एकमात्र चाँदी के मेढ़ वाला पंडाल था। बाद के समय में शेख बाजार, मंगलाबाग, चाँदनी चौक, रानीहाट, आलीशा बाजार, खाननगर जैसे 30 से अधिक पूजा पंडालों ने चाँदी के मेढ़ बनाए हैं। प्रत्येक मेढ़ में सैकड़ों किलोग्राम शुद्ध चाँदी का उपयोग होता है। केवल चाँदी के मेढ़ ही नहीं, चौधरी बाजार पूजा कमिटी ने सर्वप्रथम माँ दुर्गा और पार्श्व देवी-देवताओं को स्वर्ण मुकुट एवं आभूषणों से सजाकर “सुना बेश” की शुरुआत की थी, जिसे अन्य पंडालों ने भी अपनाया। कटक की इष्टदेवी माँ कटक चंडी के मंदिर में भी षोडशपूजा के अवसर पर देवी की पृष्ठभूमि में चाँदी से निर्मित कारीगरीपूर्ण मेढ़ शोभा पाता है। माँ चंडी के आशीर्वाद से ही कटकवासियों के मन में यह शाक्त परंपरा सदैव जीवंत रही है।
दशमी के अगले दिन आयोजित होने वाली कटक की “भसानी शोभायात्रा” केवल ओडिशा में ही नहीं, पूरे भारत में एक अनोखा उत्सव है। विजयादशमी के बाद एक साथ सौ से अधिक मेढ़ सड़कों पर उतरते हैं। कॉलेज चौक, मंगलाबाग, बक्सीबाजार, चौधरी बाजार, माणिक घोष बाजार, फिरिंगी बाजार और तेलेंगा बाजार से होकर मेढ़ देवीगड़ की ओर बढ़ते हैं। इस शोभायात्रा में ओडिशा के पारंपरिक घंटा, शंख और संबलपुरी वाद्यों से लेकर बाहरी राज्यों से आए आधुनिक ब्रास बैंड भी प्रस्तुत किए जाते हैं। पारंपरिक तोरण और सजावट के साथ मेढ़ों की चाँदी की कारीगरी प्रकाश की चमक में चमक उठती है। रातभर लाखों भक्त सड़क के दोनों ओर खड़े होकर माँ को विदाई देते हैं। काठजोड़ी नदी किनारे स्थित ऐतिहासिक “देवीगड़” पर माँ की मृण्मयी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। माँ के विसर्जन के समय प्रत्येक कटकी की आँखों में आँसू होते हैं और मुख से एक ही ध्वनि गूँजती है—“अगले साल आना माँ, सुख-शांति देकर जाना माँ।”
कटक की दुर्गापूजा केवल धन या चाँदी का प्रदर्शन नहीं है; यह पाँच शताब्दियों के इतिहास, कलाकारों के अथक परिश्रम, साही भाईचारे के अटूट बंधन और श्रद्धा का निखिल प्रतीक है। माँ के आगमन से भसानी तक जिस भावना और भक्ति में कटक बँध जाता है, वही इस शहर को वास्तव में “भाईचारे का शहर” और “कला की राजधानी” का गौरव प्रदान करता है।

