कटक, जैन परम्परा में भगवान महावीर ध्यान के महान प्रयोक्ता थे। उनकी उत्तरवर्ती आचार्य परम्परा में कई आचार्य एवं मुनि ध्यान के विशिष्ट साधक हुए है। ध्यान का अर्थ-अपने आपको देखना । अपने शरीर, मन, भाव और आत्मा के सूक्ष्म स्पन्दनों को केवल देखना और जानना ।
आचार्य महाप्रज्ञ ने इस ध्यान की पद्धति को प्रेक्षाध्यान की अभिधा से अभिहित किया। प्रेक्षा ध्यान का उद्देश्य है चित्त और मन की निर्मलता। इसे साधने के लिए काया की स्थिरता जरूरी है। ये विचार पर्युषण महापर्व आराधना के 7वें दिन ध्यान दिवस पर मुनि मोहजीत कुमारजी ने प्रकट किए।
मुनि जयेश कुमार जी ने ध्यान की उपयोगिता समझाते हुए कहा कि आज का युग वैज्ञानिक युग है। वैज्ञानिक युग की विशेषता है कि कसौटी और परीक्षण के बाद ही किसी सचाई को स्वीकार किया जाता है। इस युग में धर्म के सामने भी प्रश्न है कि उसे कसौटी पर कसा जाए।
जो बुद्धि और तर्क से कतराए, वह धर्म एक प्रबुद्ध आदमी के लिए ग्राह्य नहीं बन पाएगा। वह धर्म स्वीकार्य हो सकता है, जो प्रयोग से सिद्ध हो, जिसका अन्वेषण किया जा सके। जो अन्वेषण और अनुसंधान से परे की बात है, उसे केवल काल्पनिक कहा जाता है।
विज्ञान इसीलिए सर्वमान्य और लोकप्रिय बना है, क्योंकि वह अन्वेषण के साथ चलता है। सत्य को प्रयोगशाला में परखा जाता है, प्रयोग किया जाता है।
आज अपेक्षा है धर्म का भी प्रयोग हो। ध्यान एक ऐसा प्रयोग है जो धर्म के क्षेत्र में अन्वेषण को स्थान देता है। केवल इन्द्रियों के स्तर पर धर्म को नहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिए अतीन्द्रिय चेतना के स्तर पर जाना होता है। ध्यान के द्वारा हम बाहरी वृत्तियों से हटकर अंतर्जगत में चले जाते हैं। वहां हमारी अंतर्दृष्टि का विकास होता है। अंतर्दृष्टि के द्वारा ही धर्म को जाना जा सकता है।
तीर्थंकर दर्शन के अंतर्गत मुनि जयेश कुमार ने तीर्थकर पार्श्वनाथ के जीवन वृत के गूढ़ रहस्यों को प्रकट किया।
मुनि भव्य कुमार ने उत्तराध्ययन सूत्र के चित्त संभूत प्रसंग को सरसता से प्रस्तुत किया। मुनि मोहजीत कुमार ने भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा को 26वें भव तक कर्मों के उतार चढाव का वर्णन कर जन मानस को संबोध प्रदान किया ।
इस अवसर पर तपस्या के क्रम में अनेक तपस्वीयों ने बड़ी तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

