तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना ; आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पहलू – अभिषेक जोशी

तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना: आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पहलू

अभिषेक जोशी,

मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया

मुख्य, पतितापावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओड़िशा सुरक्षा सेना।

हिंदू धर्म और सनातन परंपरा में तिलक केवल एक चिह्न नहीं है—यह शरीर, मन और आत्मा के बीच ऊर्जा का संतुलन स्थापित करने की एक गहन प्रक्रिया है। विशेषकर जब कोई व्यक्ति आपके माथे पर तिलक लगाता है, तब आप स्वयं सिर के ऊपर या सिर के पीछे हाथ रखते हैं। इस सामान्य दिखने वाली क्रिया के पीछे गहरे आध्यात्मिक तत्व और पारंपरिक वैज्ञानिक व्याख्या छिपी हुई है।

 

आध्यात्मिक महत्व: आज्ञा चक्र (तीसरी आँख का स्थान) और सहस्रार चक्र का समन्वय। दोनों भौंहों के बीच लगाया जाता है। योग और तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस स्थान को आज्ञा चक्र कहा जाता है, जिसे “तीसरी आँख” या “अंतर्दृष्टि का केंद्र” के रूप में भी वर्णित किया गया है। आज्ञा चक्र सात चक्रों में से छठा चक्र है। यह बुद्धि, स्मृति, एकाग्रता, अंतर्दृष्टि और आध्यात्मिक चेतना का स्थान है। इस स्थान पर तिलक लगाने से मन भौतिक विचलन से दूर होकर आंतरिक चेतना की ओर ध्यान केंद्रित करता है।

 

सहस्रार चक्र – सिर के शीर्ष पर ऊर्जा का केंद्र

सिर के शीर्षभाग में स्थित सहस्रार चक्र को हजार पंखुड़ियों वाला कमल माना जाता है। यह सर्वोच्च चेतनता, दिव्य शक्ति और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है। जब माथे पर तिलक लगाया जाता है, तब सिर पर हाथ रखने से: ऊर्जा का प्रवाह सुरक्षित रहता है: आज्ञा चक्र से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा सहस्रार चक्र की ओर गति करती है। हाथ रखने से यह ऊर्जा बाहर विक्षिप्त नहीं होती, बल्कि शरीर के भीतर संतुलित रहती है।

 

एक ऊर्जा-सर्किट बनता है: तिलक और हाथ मिलकर एक प्रकार का ऊर्जा-परिपथ बनाते हैं, जो शरीर में सकारात्मक ऊर्जा को स्थिर रखता है और आशीर्वाद ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है। मानसिक स्थिरता और एकाग्रता: यह मुद्रा मन को शांत करती है, ध्यान को गहरा करती है और पूजा-अर्चना को अधिक फलप्रद बनाती है।

 

वैज्ञानिक पहलू (पारंपरिक व्याख्या)

 

यहाँ “वैज्ञानिक” शब्द आधुनिक शोध-प्रमाणित तथ्य नहीं, बल्कि आयुर्वेद, योग और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित व्याख्या है। आज्ञा चक्र के निकट पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथियाँ स्थित हैं। तिलक लगाने और हाथ रखने से इन ग्रंथियों पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे मानसिक स्थिरता, शांति और सकारात्मकता बढ़ने में सहायता मिलती है, ऐसा विश्वास किया जाता है।

 

सिर पर हाथ रखने से मस्तिष्क की ओर रक्त संचारण बेहतर होता है, ऐसा कुछ पारंपरिक व्याख्याओं में उल्लेख है। यह मस्तिष्क को ऑक्सीजन और पोषक तत्व प्रदान करके मानसिक स्पष्टता बढ़ाता है। यह मुद्रा शरीर के ऊर्जा प्रवाह को संतुलित रखती है, जिससे मन शांत रहता है और एकाग्रता बढ़ती है।

 

सिर पर हाथ रखना एक प्रकार का सुरक्षा कवच बनाता है, जो बाहरी विचलन से मन की रक्षा करता है। यह ध्यान और प्रार्थना के समय विशेष रूप से उपयोगी है।

 

हिंदू धर्म में “खाली माथा” (तिलक रहित माथा) को अशुभ माना जाता है। तिलक लगाने से पूजा, उत्सव और शुभ कार्य पूर्ण और फलप्रद होते हैं। यह शुभता का प्रतीक है।

गुरु, बड़ों या पुरोहितों से तिलक लेते समय हाथ रखने से आशीर्वाद अधिक ग्रहणशील होता है, ऐसा विश्वास है। यह मुद्रा विनय, सम्मान और आध्यात्मिक ग्रहणशीलता का प्रतीक है।

 

तिलक दोनों भौंहों के बीच समान रूप से लगाना चाहिए। यदि तिलक लगाने वाला व्यक्ति गुरु या बड़ा हो, तो तिलक लेने वाला व्यक्ति स्वयं सिर पर हाथ रखे। हाथ को सहस्रार चक्र (सिर के शीर्ष) पर रखना चाहिए, जिससे ऊर्जा प्रवाह सुरक्षित रहे।

 

तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना केवल एक परंपरा नहीं है—यह आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र के बीच ऊर्जा का संतुलन स्थापित करने, मानसिक स्थिरता बढ़ाने और आशीर्वाद को अधिक ग्रहणशील बनाने की एक गहन प्रक्रिया है। यह आज्ञा चक्र से सहस्रार चक्र तक ऊर्जा प्रवाह को सुरक्षित रखता है।

 

यह तंत्रिकाओं, ग्रंथियों और रक्त संचारण पर सकारात्मक प्रभाव डालकर मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ाता है। यह शुभता, आशीर्वाद और सम्मान का प्रतीक है। यह सरल लेकिन गहन अर्थपूर्ण परंपरा हमें याद दिलाती है कि धर्म केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसमें मानव शरीर, मन और आत्मा का विज्ञान भी निहित है।

 

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