अध्यात्म और जलवायु परिवर्तन : क्या इनमें कोई संबंध है?

५ जून को होने वाले विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर शोधपरक लेख

अध्यात्म और जलवायु परिवर्तन : क्या इनमें कोई संबंध है?

झुलसाती लू, जंगल की आग, और विनाशकारी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं ग्रह की एक तत्काल चेतावनी प्रतीत होती हैं ! विश्व के नेताओं के प्रयासों के उपरांत भी, पर्यावरणीय स्थितियां बिगड़ती जा रही है। क्या हम इस संकट के पीछे के किसी गहरे कारण को अनदेखा कर रहे हैं?

कहीं मूल कारण अध्यात्म में तो नहीं छिपा है?

अध्यात्म शास्त्र के अनुसार, ब्रह्मांड में हर वस्तु सूक्ष्म स्पंदन उत्सर्जित करती है, जो ‘त्रिगुणों’ – सत्त्व, रज, और तम से प्रभावित होते हैं। करुणा और ईमानदारी जैसे गुण ‘सत्त्व’ को बढ़ाते हैं, जबकि लालच, घृणा और स्वार्थ ‘रज-तम’ की वृद्धि करते हैं, जिससे ‘आध्यात्मिक प्रदूषण’ उत्पन्न होता है। यही आध्यात्मिक असंतुलन ‘पंचमहाभूतों’ (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को असंतुलित कर प्राकृतिक आपदाओं को जन्म देता है।

प्रकृति के चक्र और मानवीय व्यवहार
प्राचीन भारतीय ग्रंथ, ‘चरक संहिता’ में वर्णित युग चक्रों के अनुसार, वर्तमान ‘कलियुग’ आध्यात्मिक रूप से सबसे निम्न स्तर पर है, जहाँ सामूहिक अधर्म जलवायु संबंधी गड़बड़ियों का प्रमुख कारण है।

MAV के शोधकर्ताओं ने पाया है कि 98% पर्यावरणीय परिवर्तन इन्हीं चक्रीय बदलावों के कारण होते हैं, और प्राकृतिक आपदाएं प्रकृति द्वारा आध्यात्मिक संतुलन पुनः स्थापित करने का एक माध्यम हैं।
पर्यावरण के सूक्ष्म स्पंदनों पर शोध MAV के शोधकर्ताओं ने 32 देशों से एकत्रित मिट्टी और पानी के 1,000 नमूनों का ‘ऑरा मीटर’ और ‘एनर्जी स्कैनर’ से अध्ययन किया। निष्कर्ष चौंकाने वाले थे :
1. भारत के बाहर के 83% से अधिक नमूनों ने नकारात्मक स्पंदन उत्सर्जित पाए गए, जिनमें एक वर्ष में नकारात्मकता 500% तक बढ़ी ।
2. भारत में 65% से अधिक नमूनों में सकारात्मक स्पंदन थे। भौतिक रूप से प्रदूषित नदियाँ भी 6 मीटर तक के सकारात्मक स्पंदन उत्सर्जित करती पाई गईं।
3. आध्यात्मिक रूप से पवित्र स्थानों (मंदिरों/आश्रमों) और वहां के पौधों ने उच्च सकारात्मकता प्रदर्शित की।

शोधकर्ता इस अंतर का कारण भारत में आध्यात्मिकता, शाकाहार और संतों की उपस्थिति को मानते हैं। इसके विपरीत, भौतिकवाद और साधना का अभाव पर्यावरण को नकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। फलस्वरूप सूक्ष्म और शक्तिशाली नकारात्मक ऊर्जाएं पनपती हैं और मानव जाति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। इसे उन्नत छठी इंद्रीय का उपयोग करके एक साधक द्वारा बनाए गए सूक्ष्म चित्र से समझा जा सकता है।

साधना: पर्यावरण शुद्धि का समाधान !
MAV के शोध से सिद्ध हुआ है कि नामजप, यज्ञ और सात्विक जीवन शैली जैसी साधनाएं न केवल मनुष्य के सप्तचक्रों और ऊर्जा-क्षेत्र को शुद्ध करती है, बल्कि उसके आसपास के वातावरण में भी सकारात्मक स्पंदन बढ़ाती हैं। वर्तमान समय में संतों ने विशेष रूप से “श्री राम जय राम जय जय राम” के जाप का मार्गदर्शन दिया है।

इस ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर, यह दृष्टिकोण एक नई दिशा देता है: यदि मानवीय विचारों और कार्यों में प्रदूषण विद्यमान हो सकता है, तो पर्यावरण की शुद्धि भी आंतरिक आध्यात्मिक परिवर्तन और सामूहिक चेतना में वृद्धि से ही की जा सकती है !

संकलनकर्ता : श्री शॉन क्लार्क, शोधप्रमुख (रिसर्चलीड), महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय (MAV)

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