डॉ मोहित अग्रवाल
यह लेख श्याम सुंदर पोद्दार (संस्थापक अध्यक्ष, लघु उद्योग भारती, उड़ीसा) के विचारों पर आधारित है। उन्होंने मारवाड़ी समाज के औद्योगिक पतन पर चिंता व्यक्त की है और युवा पीढ़ी को एक नई दिशा दिखाने का प्रयास किया है।
मारवाड़ी समाज: गौरवशाली अतीत और भविष्य की चुनौतियां
लेखक: श्याम सुंदर पोद्दार (B.E., Jadavpur; MBA, Calcutta)
मारवाड़ी समाज का इतिहास भारत की अर्थव्यवस्था का स्वर्णिम अध्याय रहा है। एक दौर वह था जब देश के शीर्ष दस उद्योगपतियों में से आठ मारवाड़ी होते थे। लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। अब शीर्ष सूची में मारवाड़ी समाज का प्रतिनिधित्व सिमट गया है और अंबानी-अडानी जैसे गुजराती उद्योगपतियों ने अपनी महत्वाकांक्षा से नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
1. पिछड़ने के प्रमुख कारण: दृष्टि की कमी (Lack of Vision)
लेखक के अनुसार, मारवाड़ी समाज के बड़े घरानों ने बदलते समय के साथ “भविष्य के उद्योगों” को पहचानने में चूक कर दी।
* उदाहरण: जहाँ टाटा ने सॉफ्टवेयर की शक्ति को पहचाना और TCS के माध्यम से खुद को शीर्ष पर बनाए रखा, वहीं कई मारवाड़ी घरानें पारंपरिक उद्योगों तक ही सीमित रहे।
* अवसरों की अनदेखी: आज स्वास्थ्य सेवा (Healthcare) जैसे क्षेत्र एक बड़े उद्योग के रूप में उभरे हैं (जैसे अपोलो अस्पताल), लेकिन मारवाड़ी समाज यहाँ पिछड़ गया।
2. इतिहास से सीख: पूर्वजों का साहस और संघर्ष
पूर्वजों की सफलता का राज उनकी महत्वाकांक्षा और जोखिम लेने की क्षमता थी।
* ताराचंद घनश्याम दास: १५० वर्षों तक भारत की सबसे बड़ी फर्म के रूप में विख्यात रही, जिसकी आर्थिक शक्ति ‘इंपीरियल बैंक ऑफ इंग्लैंड’ के समकक्ष थी।
* अंग्रेजों की नीति: १८५७ के बाद अंग्रेजों ने कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे बंदरगाहों को बढ़ावा देकर राजस्थान के पारंपरिक व्यापारिक मार्गों को बाधित किया। इसके बावजूद मारवाड़ी समाज ने कलकत्ता जाकर जूट और शेयर बाजार में अपनी धाक जमाई।
* महारथियों का निर्माण: रामकृष्ण डालमिया और रामकुमार बांगड़ जैसे दिग्गजों ने छोटे स्तर पर प्रशिक्षण लेकर बड़े औद्योगिक साम्राज्य खड़े किए।
3. सामाजिक उत्तरदायित्व: धर्म और शिक्षा का संगम
मारवाड़ी समाज ने केवल धन ही नहीं कमाया, बल्कि उसका उपयोग राष्ट्र निर्माण में भी किया।
* संस्थानों का निर्माण: बिड़ला, पोद्दार, गोयनका और जयपुरिया जैसे परिवारों ने शिक्षण संस्थान, ब्राह्मण निवास, गौशालाएं और मंदिर बनवाकर समाज की नींव मजबूत की।
* महिला शिक्षा: सूरजमल नागरमल जैसे दूरदर्शियों ने लड़कियों के लिए विद्यालय बनाए।
4. आधुनिक सफलता के प्रेरणापुंज
आज भी जहाँ मारवाड़ी युवाओं ने महत्वाकांक्षा दिखाई, वे वैश्विक स्तर पर चमके:
* लक्ष्मी निवास मित्तल: कलकत्ता से निकलकर इंडोनेशिया में बीमार फैक्ट्रियों को पुनर्जीवित किया और ‘स्टील किंग’ बने।
* अनिल अग्रवाल (वेदांत): पटना से बंबई जाकर एक छोटे कारखाने से बड़े साम्राज्य की शुरुआत की।
* राधेश्याम अग्रवाल (इमामी): चार्टर्ड अकाउंटेंट की नौकरी/प्रैक्टिस के बजाय उद्योग चुना और ‘इमामी’ जैसा ब्रांड खड़ा किया।
लेखक का संदेश: नौकरी नहीं, उद्योग चुनें
श्याम सुंदर पोद्दार स्वयं एक उदाहरण हैं। जादवपुर यूनिवर्सिटी और कलकत्ता विश्वविद्यालय (MBA) से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने सरकारी निवेश का कर्ज चुकाने के लिए विदेशी नौकरी के बजाय भारत में उद्योग लगाना चुना। आज उनकी तीन कंपनियों में १००० लोग कार्यरत हैं।
युवा पीढ़ी से आह्वान:
> “जो मारवाड़ी युवा IIT और IIM जैसे संस्थानों से पढ़कर अपनी प्रतिभा सिद्ध कर चुके हैं, वे ‘बेस्ट ब्रेन’ (Best Brains) हैं। मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि नौकरी के पीछे भागने के बजाय उद्योगपति बनें। अपने पूर्वजों की साहसपूर्ण परंपरा को जीवित रखें और एक नया औद्योगिक साम्राज्य स्थापित कर राष्ट्र सेवा करें।”

