आज बड़ा अजीब-सा दिन है,
लोग कहते हैं – मित्रता दिवस है
सोचती हूँ, क्या मित्रता भी
कैलेंडर की कोख से जन्म लेती है?
हर रिश्ते को बाँध दिया है
एक तिथि, एक रीति, एक औपचारिकता में –
पिता का दिन, माँ का दिन,
प्रेम का भी कोई निर्धारित क्षण ?
क्या भावनाएँ कभी
ढलती हैं तारीख़ों में?
क्या अपनापन भी
पलता है साल में एक दिन ?
मुझे समझ नहीं आता
कैसे सीमित कर दूँ
अपनी आत्मा के अटूट रिश्तों को
सिर्फ़ एक दिन की परिधि में ?
मेरा तो समस्त जीवन ही
साधना है संबंधों की
प्रेम हो या मित्रता,
स्नेह हो या मौन विश्वास
हर पल-छिन है एक उत्सव…
मीत !
बस यही कामना है तुम्हारे लिए
तुम्हारा जीवन सदा
भरपूर रहे मिलन की मिठास से,
महकता रहे मित्रता और प्रेम की सुवास से…
तारीख़ों से परे, शब्दों से आगे
दिलों में रची वह सच्ची मित्रता
बस बहे यूँ ही…
हर दिवस, हर साँझ, हर प्रहर…!!
पुष्पा सिंघी, कटक

