नवरात्र हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक पर्व एवं देवी-उपासना का विशेष काल है। आदिशक्ति श्री दुर्गादेवी की आराधना से संबंधित यह पर्व अनेक स्थानों पर कुलाचार के रूप में भी मनाया जाता है। जगत्पालिनी एवं जगदोद्धारिणी मां शक्ति की उपासना हिन्दू धर्म में विशेष रूप से दो बार नवरात्र के रूप में की जाती है। इस वर्ष शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, 11 अक्टूबर 2026 से प्रारम्भ हो रहा है।
नवरात्र केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना, आत्मशुद्धि और अपने भीतर की आसुरी वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने का आध्यात्मिक अवसर है। वर्तमान समय में अनेक स्थानों पर नवरात्रोत्सव का स्वरूप मनोरंजनप्रधान एवं धर्मविरुद्ध आचरणों से प्रभावित होता दिखाई देता है। ऐसे में उत्सव की पवित्रता एवं सात्त्विकता बनाए रखना धर्मपालन का महत्त्वपूर्ण अंग है।
*नवरात्र का धार्मिक महत्त्व*
देवीमाहात्म्य में देवी के विभिन्न स्वरूपों तथा आसुरी शक्तियों पर उनकी विजय का वर्णन मिलता है। महिषासुर द्वारा देवताओं को पीड़ा दिए जाने पर आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ और देवी ने उसका वध किया। इसी कारण देवी को ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहा जाता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, नारदजी ने श्रीरामजी को रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु देवी की उपासना एवं नवरात्र व्रत करने का मार्गदर्शन दिया था। देवी की आराधना से शक्ति प्राप्त कर श्रीरामजी ने रावण का वध किया।
नवरात्र के नौ दिनों में देवी के विविध स्वरूपों की उपासना की जाती है। इस काल में ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः’ नामजप करना विशेष लाभदायक माना गया है।

*देवी के विविध स्वरूप*
श्रीदुर्गासप्तशती में देवी के विविध स्वरूपों का वर्णन मिलता है। उपासना की परंपरा में महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली को देवी के प्रमुख स्वरूप माना जाता है। नवरात्र में पंचमी, षष्ठी, अष्टमी एवं नवमी तिथियों का विशेष धार्मिक महत्त्व है। अनेक स्थानों पर इन तिथियों में चंडीहोम आदि धार्मिक विधियां की जाती हैं।
*नवरात्र व्रत एवं उपासना*
नवरात्र के प्रथम दिन स्वच्छ एवं पवित्र स्थान पर देवी की स्थापना तथा घटस्थापना की जाती है। अपनी कुलपरंपरा एवं शास्त्रीय पद्धति के अनुसार देवी का पूजन किया जाता है। परंपरा के अनुसार मिट्टी की वेदी में विभिन्न धान्य बोए जाते हैं और नौ दिनों तक उनकी पूजा की जाती है।
अपनी श्रद्धा एवं सामर्थ्य के अनुसार देवी का नामजप, श्रीदुर्गासप्तशती पाठ, चंडीपाठ, अखंड दीप प्रज्वलन, कुमारिका एवं सुवासिनी पूजन, उपवास, जागरण तथा देवीभागवत श्रवण आदि किए जाते हैं। अपनी कुलपरंपरा के अनुसार साधक ब्रह्मचर्य, साधारण शय्या पर विश्राम, जूते-चप्पल का त्याग आदि आचारों का भी पालन करते हैं।
नवमी अथवा दशमी को परंपरा के अनुसार समाराधना कर नवरात्र की उपासना पूर्ण की जाती है। नवरात्र में बोए गए धान्य के अंकुर देवी को अर्पित करने की भी परंपरा है।
*आसुरी वृत्तियों पर विजय का संदेश*
मनुष्य के भीतर अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर एवं विषयासक्ति जैसी आसुरी वृत्तियां हो सकती हैं। नवरात्र हमें इन प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर श्रद्धा, संयम, करुणा, सदाचार एवं सात्त्विकता जैसे दैवी गुणों का विकास करने की प्रेरणा देता है।
श्रीदुर्गासप्तशती में देवी की स्तुति करते हुए कहा गया है—
*“शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।*
*सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥”*
— श्रीदुर्गासप्तशती, अध्याय 11, श्लोक 12
*अर्थ : हे देवी नारायणी! शरण में आए हुए दीन एवं पीड़ित लोगों की रक्षा करने में सदैव तत्पर तथा सभी के कष्टों को दूर करनेवाली हे देवी, आपको नमस्कार है।*
अतः नवरात्र में देवी की श्रद्धापूर्वक उपासना, नामजप एवं साधना कर उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें आसुरी वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दें और हमारे जीवन में सात्त्विकता का विकास करें।
नवरात्र को केवल मनोरंजन का पर्व न बनाकर देवी की उपासना, आत्मशुद्धि एवं दैवी गुणों के संवर्धन का पर्व बनाना ही इस उत्सव की वास्तविक सार्थकता है।

