महात्मा गांधी का अहिंसा दर्शन और ओड़िशा के साथ उनका संबंध 
अभिषेक जोशी,
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
मुख्य, पतितापावन सेवा फाउंडेशन और ओडिशा सुरक्षा सेना
महात्मा गांधी केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नेता नहीं हैं, वे विश्व इतिहास में अहिंसा और सत्याग्रह के महान प्रवक्ता के रूप में परिचित हैं। उनका दर्शन केवल राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं था; यह सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिवर्तन का भी एक शक्तिशाली माध्यम था। ओड़िशा के साथ गांधीजी का संबंध अत्यंत गहरा था—उन्होंने इस भूमि को “मेरे प्रेम का देश” (Land of my love) कहा था। 1921 से 1946 के बीच उन्होंने कई बार ओडिशा का दौरा किया और यहाँ के लोगों को स्वराज, सत्याग्रह और सर्वोदय का संदेश दिया।
गांधीजी के मत के अनुसार अहिंसा केवल हिंसा न करना नहीं है, बल्कि यह एक सक्रिय शक्ति है जो विचार, वाणी और कर्म—तीन स्तरों पर लागू होती है। उन्होंने कहा था, “अहिंसा मानव जाति का नियम है, जहाँ हिंसा पशुओं का नियम है।” उनकी दृष्टि में वास्तविक अहिंसा है—दूसरे के शरीर, मन और बुद्धि को किसी भी प्रकार की क्षति न पहुँचाना।
गांधीजी अहिंसा को एक “वैज्ञानिक पद्धति” के रूप में देखते थे और 50 वर्षों तक इसका परीक्षण करते रहे। उनके मत के अनुसार अहिंसा केवल व्यक्तिगत शांति के लिए नहीं, बल्कि समाज के नैतिक आचरण का एक नियम है।
ओड़िशा के साथ गांधीजी का संबंध: गांधीजी पहली बार 22 मार्च 1921 को ओड़िशा आए थे। उस समय ओड़िशा एक स्वतंत्र प्रदेश नहीं था; लेकिन गांधीजी समझ गए थे कि ओड़िया भाषा बोलने वाले लोगों की एक विशेष सांस्कृतिक और भाषाई पहचान है। उनकी यात्रा ने ओडिशा के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
1921 में उन्होंने कटक और अन्य स्थानों पर भाषण देकर असहयोग आंदोलन को ओडिशा में प्रचारित किया। ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी, सामाजिक स्थिति और ग्रामीण जीवन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने ओडिशावासियों को खादी वस्त्र पहनने, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने और ग्रामीण उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रोत्साहित किया। अछूतपन के उन्मूलन, महिला शिक्षा, शराब विरोधी आंदोलन और हरिजनों के उत्थान के लिए उन्होंने ओडिशा में कार्य किया।
उत्कलमणि गोपबंधु दास, मधुसूदन दास, नीलकंठ दास, फकीरमोहन सेनापति जैसे कई ओड़िया नेता गांधीजी के दर्शन से प्रभावित थे। गोपबंधु दास के साथ गांधीजी की गहरी मित्रता थी और उन्होंने ओड़िशा में गांधीवादी आदर्शों को लोगों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधीजी का अहिंसा दर्शन ओडिशा के सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।
सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन: 1921 में गांधीजी की ओडिशा यात्रा के बाद ओडिशा में असहयोग आंदोलन तेज हो गया। ओड़िया लोगों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध शुरू किया—विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, सरकारी नौकरियाँ छोड़ना, कानून तोड़ आंदोलन आदि।
खादी और ग्रामीण उद्योगों का पुनरुद्धार: गांधीजी ने ओडिशा में खादी प्रचलन को प्रोत्साहित किया। वे समझ गए थे कि ओडिशा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। उनके प्रयासों से ओडिशा के कई गाँवों में खादी केंद्र स्थापित हुए।
सामाजिक सुधार और अछूतपन का उन्मूलन: गांधीजी ओडिशा दौरा के दौरान अछूतपन के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया। उन्होंने हरिजनों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने का प्रयास किया और मंदिर प्रवेश अधिकार के लिए आंदोलन किया।
शिक्षा और महिला विकास: गांधीजी ने ओडिशा में महिला शिक्षा और ग्रामीण शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयास किए। उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया और ओडिशा की कई महिला नेताएँ गांधीवादी आदर्शों से प्रेरित हुईं।
गांधीजी ने ओड़िशा को “Land of my love” कहा क्योंकि वे यहाँ की सरल जीवनशैली, ग्रामीण संस्कृति और लोगों के निष्ठावान स्वभाव से मुग्ध हो गए थे। उनके मत के अनुसार ओड़िशा की गरीबी भारत की वास्तविक तस्वीर को दर्शाती थी और इस गरीबी को दूर करने के लिए कार्य करना उनके लिए एक नैतिक दायित्व था।
1921 से 1946 के बीच गांधीजी ने कई बार ओड़िशा का दौरा किया—कटक, पुरी, बालेश्वर, संबलपुर, कोरापुट आदि स्थानों पर उन्होंने भाषण दिए और लोगों के साथ समय बिताया। उनकी अंतिम ओडिशा यात्रा 1946 में हुई, जब वे कोरापुट के आदिवासी क्षेत्र का दौरा करके उनकी जीवनशैली और समस्याओं को समझने का प्रयास किया।
आज भी ओड़िशा में गांधीजी के आदर्श जीवित हैं। हर वर्ष 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर ओडिशा के मुख्यमंत्री और अन्य नेता उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा है कि गांधीजी के सत्य और अहिंसा के आदर्शों का अनुसरण कर ओड़िशा एक “समृद्ध ओड़िशा” और “विकसित भारत” का निर्माण करेगा।
गांधीजी की स्वच्छता के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता आज ओड़िशा के स्वच्छता मिशन में परिलक्षित होती है। ओड़िशा सरकार खादी और ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहित कर गांधीजी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को वास्तविकता में बदलने का प्रयास कर रही है। ओड़िशा के विभिन्न सामाजिक आंदोलनों में अहिंसक प्रतिरोध की गांधीवादी पद्धति आज भी देखी जाती है।
महात्मा गांधी का अहिंसा दर्शन केवल भारत को स्वतंत्रता नहीं दिलाया, बल्कि संपूर्ण विश्व को शांति और न्याय का मार्ग दिखाया। ओड़िशा के साथ उनका संबंध केवल राजनीतिक नहीं था; यह एक गहरा भावनात्मक और नैतिक बंधन था। गांधीजी की अहिंसा, सत्याग्रह और सर्वोदय के आदर्श आज भी ओड़िशा के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रभाव डाल रहे हैं। उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का सर्वोत्तम तरीका है—उनके आदर्शों को जीवन में अपनाना और एक अहिंसक, सत्यनिष्ठ और समाजसेवी जीवन का निर्माण करना।

