बलिप्रतिपदा (दीपावली पाडवा) : त्याग, दान और ईश्वरीय कृपा का पर्व

दानवीर किंतु विवेकहीन बलिराजा को भगवान श्रीविष्णु ने वामनावतार धारण कर पाताल लोक भेजा था। यह दिन उसी घटना की स्मृति से जुड़ा है। भगवान वामन ने तीन पग भूमि का दान मांगकर बलिराजा को पाताल भेजा; किंतु वास्तव में यह उनके कल्याण का ही माध्यम बना। दीपावली मनाने की परंपरा के पीछे भी इस घटना का विशेष महत्त्व है।

आइए, सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख के माध्यम से बलिप्रतिपदा पर्व का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व जानें।

 

*1. तिथि*

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को बलिप्रतिपदा अथवा दीपावली पाडवा कहा जाता है। भगवान श्रीविष्णु ने इस तिथि को बलिराजा के नाम से संबद्ध किया, इसलिए इसे ‘बलिप्रतिपदा’ कहा जाता है।

 

*2. बलिराजा से संबंधित ऐतिहासिक प्रसंग एवं महत्त्व*

 

बलिराजा अत्यंत दानवीर थे। उनके द्वार पर आने वाला कोई भी व्यक्ति जो कुछ मांगता, वे उसे दे देते थे। दान देना निश्चित रूप से एक उत्तम गुण है; किंतु किसी भी गुण का अतिरेक दोष बन सकता है। किसे, कब और कहां दान देना चाहिए, इसका विवेकपूर्ण विचार करना आवश्यक है। धर्मशास्त्रों एवं श्रीमद्भगवद्गीता में भी दान के संबंध में उचित मार्गदर्शन किया गया है। दान सदाचारी एवं सुपात्र व्यक्ति को ही देना चाहिए, अपात्र व्यक्ति को नहीं।

अपात्र व्यक्ति के हाथों में धन जाने से उसके अहंकार एवं अनुचित आचरण को बढ़ावा मिल सकता है। बलिराजा बिना विचार किए प्रत्येक याचक को उसकी इच्छानुसार दान दे देते थे। तब भगवान श्रीविष्णु ने उनका मार्गदर्शन करने के लिए वामनावतार धारण किया।

भगवान वामन बलिराजा के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। बलिराजा ने उनसे पूछा, “आपको क्या चाहिए?” वामन ने उत्तर दिया, “मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।” बलिराजा इस बात से अनभिज्ञ थे कि वामन वास्तव में कौन हैं और इस दान का क्या परिणाम होगा। उन्होंने तीन पग भूमि दान में देने का संकल्प कर लिया।

तत्पश्चात भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। उन्होंने एक पग में संपूर्ण पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश नाप लिया। इसके बाद उन्होंने बलिराजा से पूछा, “अब तीसरा पग कहां रखूं?” बलिराजा ने विनम्रतापूर्वक कहा, “प्रभु, तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।” भगवान वामन ने उनके मस्तक पर तीसरा पग रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया।

इसके पश्चात भगवान वामन ने बलिराजा से वरदान मांगने के लिए कहा। बलिराजा ने प्रार्थना की, “जब आप मुझे पाताल लोक भेजेंगे, तब पृथ्वी पर वर्ष में तीन दिन मेरा राज्य रहे। जो व्यक्ति यमदेव के पूजन हेतु दीपदान करेगा, उसे यमयातना न सहनी पड़े, उसकी अकालमृत्यु न हो तथा उसके घर में सदैव लक्ष्मी का वास रहे।”

ये तीन दिन हैं — कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, कार्तिक अमावस्या और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा। इन दिनों को ‘बलिराज्य’ कहा जाता है।

 

*3. बलिप्रतिपदा का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व*

बलिप्रतिपदा अर्थात दीपावली पाडवा साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से आधा मुहूर्त माना जाता है। यह विक्रम संवत की कालगणना के अनुसार नववर्षारंभ का दिन भी है।

 

*4. बलिप्रतिपदा मनाने की धार्मिक परंपराएं*

इस दिन बलिराजा की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है तथा नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसे बलिराजा की भूख-प्यास शांत करने का प्रतीक माना जाता है। भूमि पर पंचरंगी रंगोली से बलिराजा एवं उनकी पत्नी विंध्यावली के चित्र बनाए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इसके पश्चात बलिराजा के निमित्त दीपदान एवं वस्त्रदान किया जाता है।

प्रातःकाल अभ्यंग स्नान करने के बाद स्त्रियां अपने पति की आरती उतारती हैं। दोपहर में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तथा घर में विविध स्वादिष्ट पकवान बनाकर उत्सव मनाया जाता है।

*अ. पति की आरती उतारने का आध्यात्मिक महत्त्व*

आध्यात्मिक दृष्टि से स्त्री को दुर्गातत्त्व का तथा पुरुष को शिवतत्त्व का प्रतीक माना गया है। जब स्त्री अपने पति की आरती उतारती है, तब उसमें स्थित दुर्गातत्त्व सक्रिय होता है और पति में स्थित सुप्त शिवतत्त्व (कुंडलिनीशक्ति) जागृत होने में सहायता मिलती है।

*आ. बलिराज्य के समय धर्मशास्त्र का मार्गदर्शन*

धर्मशास्त्र के अनुसार बलिराज्य के समय निषिद्ध कर्मों को छोड़कर अन्य योग्य आचरण किए जा सकते हैं। अभक्ष्यभक्षण, अपेयपान (मद्यपान) और अगम्यागमन निषिद्ध कर्म माने गए हैं।

इसी मान्यता के अनुसार इस दिन लोग आतिशबाजी करते हैं; किंतु मद्यपान से दूर रहते हैं। इस प्रकार शास्त्रसम्मत मर्यादाओं का पालन करते हुए उत्सव एवं आनंद मनाया जाता है।

इस दिन लोग नए वस्त्र धारण करते हैं और पूरे दिन हर्षोल्लास के साथ पर्व मनाते हैं।

*इ. गोवर्धन पूजा की परंपरा*

बलिप्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजा करने की भी परंपरा है। इसके अंतर्गत गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतिकृति बनाई जाती है तथा उस पर दूर्वा एवं पुष्प अर्पित किए जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण, इंद्रदेव, गायों एवं बछड़ों के चित्र बनाकर उनकी पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर इस अवसर पर जुलूस भी निकाला जाता है।

 

*5. बलिराजा के जीवन से मिलनेवाली प्रेरणा*

बलिराजा ने असुर कुल में जन्म लेने के बावजूद अपने पुण्यकर्मों एवं समर्पणभाव से भगवान वामन की कृपा प्राप्त की। उन्होंने ईश्वरीय कार्य को समझकर जनसेवा की। वे सात्त्विक स्वभाव के एवं दानशील राजा थे। मनुष्य जन्म से अज्ञानी हो सकता है; किंतु ज्ञान एवं ईश्वरीय कृपा प्राप्त होने पर वह देवत्व की ओर अग्रसर हो सकता है। बलिराजा का जीवन इसका प्रेरक उदाहरण है।

सत्कर्म करनेवाले व्यक्ति को मृत्यु का भय नहीं रहता; यहां तक कि यमदेव भी उसके मित्र बन जाते हैं। भगवान के वामनावतार से यह शिक्षा मिलती है कि जो भक्त अपना सर्वस्व ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, उसके कल्याण के लिए भगवान स्वयं तत्पर रहते हैं।

बलिराजा असुर वंश में जन्मे थे; किंतु उनकी उदारता, पुण्यकर्मों एवं भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ने उन्हें मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर किया। भगवान ने उनके जीवन को उचित दिशा प्रदान कर उनका कल्याण किया। उन्होंने अपने राज्य में आसुरी भोगवृत्ति को दूर कर त्यागभावना एवं दिव्य विचारों का प्रसार किया, जिससे प्रजा को सुख एवं समृद्धि प्राप्त हुई।

*— परात्पर गुरु परशुराम माधव पांडे महाराज*

 

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