कार्तिक अमावस्या अर्थात लक्ष्मीपूजन के दिन मंदिरों, दुकानों और घरों में श्रद्धापूर्वक श्री लक्ष्मीपूजन किया जाता है। दीपावली का यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सामान्यतः अमावस्या को अशुभ माना जाता है; किंतु दीपावली की यह अमावस्या शरद पूर्णिमा (कोजागिरी पूर्णिमा) की भांति कल्याणकारी और समृद्धिदायक मानी गई है।
इस दिन श्री लक्ष्मीपूजन के साथ-साथ ‘अलक्ष्मी निःसारण’ अर्थात दरिद्रता एवं अशुभता के प्रतीक अलक्ष्मी को दूर करने की विधि भी की जाती है। आइए, जानते हैं कि लक्ष्मीपूजन के दिन किए जानेवाले विविध धार्मिक कृत्यों के पीछे कौन-सा शास्त्र निहित है।
*1. लक्ष्मीपूजन से संबंधित पौराणिक इतिहास*
पौराणिक कथा के अनुसार, लक्ष्मीपूजन के दिन भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी सहित सभी देवताओं को राजा बलि के कारागार से मुक्त किया। इसके पश्चात सभी देवता क्षीरसागर में जाकर विश्राम करने लगे।
*2. लक्ष्मीपूजन की शास्त्रोक्त विधि*
लक्ष्मीपूजन के दिन प्रातःकाल मंगलस्नान कर देवपूजन किया जाता है। दोपहर में पार्वण श्राद्ध एवं ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। प्रदोषकाल में लता-पल्लवों से सुसज्जित मंडप में देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु, कुबेर आदि देवताओं का पूजन किया जाता है।
पूजन के समय चौकी पर अक्षत (चावल) से अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाकर उस पर देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कुछ स्थानों पर कलश स्थापित कर उसके ऊपर तांबे का पात्र रखा जाता है और उस पर लक्ष्मीजी की मूर्ति विराजमान की जाती है। लक्ष्मीजी के समीप कलश पर कुबेर की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है।
इसके पश्चात लक्ष्मीजी सहित अन्य देवताओं को लवंग, इलायची और चीनी मिलाकर बनाए गए गाय के दूध के खोवे का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। साथ ही धनिया, गुड़, धान की लावा, बताशे आदि भी अर्पित किए जाते हैं। बाद में यह प्रसाद परिजनों में वितरित किया जाता है। इसके पश्चात ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है तथा रात्रि में जागरण किया जाता है।
*पूजन सामग्री उपलब्ध न होने पर क्या करें ?*
यदि लक्ष्मीपूजन के लिए सभी आवश्यक सामग्री उपलब्ध न हो, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जो सामग्री सहज उपलब्ध हो, उसी से श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक पूजन करना चाहिए। बताशे आदि उपलब्ध न होने पर घर में उपलब्ध घी-चीनी अथवा कोई अन्य मीठा पदार्थ नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जा सकता है।
*लक्ष्मी किनके घर में निवास करती हैं ?*
कार्तिक अमावस्या की रात्रि में जागरण करने की परंपरा है। पुराणों में वर्णन है कि इस रात्रि में देवी लक्ष्मी संपूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने निवास के लिए उपयुक्त स्थान खोजती हैं।
स्वच्छता, सुंदरता और सुव्यवस्था से युक्त घर देवी लक्ष्मी को आकर्षित करते हैं। इसके साथ ही वे ऐसे घरों में निवास करना पसंद करती हैं, जहां चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ, संयमी, धर्मनिष्ठ, ईश्वरभक्त एवं क्षमाशील व्यक्ति तथा सद्गुणी स्त्रियां रहती हैं। अर्थात केवल बाहरी स्वच्छता ही नहीं, अपितु घर के सदस्यों का आचरण और गुण भी लक्ष्मी के स्थायी निवास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
*3. लक्ष्मीपूजन दिवस का विशेष महत्व*
सामान्यतः अमावस्या को अशुभ माना गया है; किंतु दीपावली की यह अमावस्या इसका अपवाद है। यह दिन शुभ माना जाता है; हालांकि इस दिन सभी प्रकार के कार्य करना शुभ नहीं माना गया है। इसलिए इसे केवल ‘शुभ दिन’ कहने की अपेक्षा ‘आनंददायक दिन’ कहना अधिक उचित है।
*4. लक्ष्मीदेवी से की जानेवाली प्रार्थना का आध्यात्मिक भाव*
लक्ष्मीपूजन के समय जमा-खर्च की लेखा-बही देवी लक्ष्मी के समक्ष रखकर उनसे प्रार्थना की जाती है –
“हे माता लक्ष्मी ! आपके आशीर्वाद से प्राप्त धन का उपयोग हमने सत्कार्यों एवं ईश्वरीय कार्यों में किया है। उसका संपूर्ण लेखा-जोखा आपके समक्ष प्रस्तुत है। इस पर आपकी स्वीकृति बनी रहे। आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। यदि मैंने आपके धन का दुरुपयोग किया, तो आप मुझसे दूर चली जाएंगी, इसका मुझे सदैव स्मरण है।
अतः हे लक्ष्मीदेवी ! मेरे खर्चों को स्वीकृति प्रदान करने हेतु भगवान से मेरे लिए अनुरोध करें; क्योंकि आपके अनुरोध के बिना वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे। आगामी वर्ष में भी हमारा कार्य सुचारु रूप से संपन्न हो, ऐसी कृपा करें।”
इस प्रार्थना के माध्यम से धन को केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का साधन न मानकर उसका उपयोग सत्कार्यों एवं ईश्वरीय कार्यों के लिए करने का भाव व्यक्त होता है।
*5. लक्ष्मीपूजन की रात्रि में कचरा बाहर निकालने का शास्त्र : अलक्ष्मी निःसारण*
*महत्व :*
जिस प्रकार सद्गुणों की वृद्धि आवश्यक है, उसी प्रकार दोषों का निर्मूलन भी आवश्यक है। यदि गुणों की वृद्धि हो; किंतु दोष बने रहें, तो गुणों का वास्तविक महत्व नहीं रहता। इसी प्रकार लक्ष्मीप्राप्ति के साथ अलक्ष्मी का नाश होना भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से इस दिन नई झाड़ू खरीदने की परंपरा है, जिसे ‘लक्ष्मी’ कहा जाता है।
*विधि :*
रात्रि के मध्य में नई झाड़ू से घर की सफाई कर कचरा टोकरी में एकत्रित करके घर के बाहर फेंका जाता है। इसे ‘अलक्ष्मी निःसारण’ कहते हैं। अन्य दिनों में रात्रि के समय झाड़ू लगाना अथवा कचरा बाहर निकालना वर्जित माना जाता है; किंतु इस रात्रि में विशेष रूप से ऐसा किया जाता है।
कचरा बाहर निकालते समय सूप और दमड़ी (छोटी थाली) बजाकर अलक्ष्मी को दूर भगाने की परंपरा भी है।
*6. लक्ष्मीपूजन में अक्षतों से अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाने का शास्त्र*
लक्ष्मीपूजन के समय अक्षत (चावल) से अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाकर उस पर देवी लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। सामान्यतः सभी देवताओं के पूजन में अक्षत का आसन अर्पित किया जाता है।
अन्य देवताओं की तुलना में अक्षत में श्री लक्ष्मी का तत्व 5% अधिक मात्रा में आकर्षित होता है; क्योंकि अक्षत में लक्ष्मी की सगुण-संपन्नता की तरंगों को ग्रहण करने की क्षमता होती है। अक्षत में तारक एवं मारक तरंगों को ग्रहण कर उनका प्रक्षेपण करने की शक्ति होती है। इसी कारण लक्ष्मीपूजन में अक्षत से अष्टदल कमल अथवा स्वस्तिक बनाया जाता है।
स्वस्तिक में निर्गुण तत्व को जागृत करने की क्षमता होती है। इसलिए देवी लक्ष्मी के आसन के रूप में स्वस्तिक बनाने का विधान बताया गया है।
*7. देवी लक्ष्मी को ‘चंचला’ (अस्थिर) क्यों कहा जाता है ?*
जब कोई व्यक्ति किसी देवता की उपासना करता है, तब उस देवता का तत्व उसकी ओर आकर्षित होता है और उसके अनुरूप फल एवं लक्षण प्रकट होते हैं। उदाहरणार्थ, देवी लक्ष्मी की उपासना से धन की प्राप्ति होती है।
परंतु जब व्यक्ति की उपासना घटती है और अहंकार बढ़ने लगता है, तब देवता का तत्व उससे दूर होने लगता है। इसी कारण कहा जाता है कि लक्ष्मी व्यक्ति का साथ छोड़ देती हैं। किंतु अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने के स्थान पर व्यक्ति यह कहता है कि ‘लक्ष्मी चंचल हैं।’
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि देवी लक्ष्मी वास्तव में चंचला होतीं, तो वे भगवान विष्णु के चरणों का साथ कभी का छोड़ चुकी होतीं ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

