224वां आचार्य भिक्षु चरमोत्सव मनाया

बॉस नही लीडर थे आचार्य श्री भिक्षु

कटक, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य प्रणेता आचार्य श्री भिक्षु के 224 वें चरमोत्सव पर युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि मोह‌जीत कुमार जी ने भावांजली प्रस्तुत करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु के सामने आत्म कल्याण का लक्ष्य था। उसकी सम्पूर्ति के लिए वें आचार निष्ठा अनुशासन और जिनवाणी पर सर्वात्मना समर्पित थे। उन्हीं भावों से भरा उनका स्वर था- हे प्रभो! यह तेरापंथ ।

आचार्य भिक्षु ने आचार और विचार शुद्धि के लिए एक क्रान्ति का शंखनाद किया। जिसमें आचार निष्ठा, अनुशासन निष्ठा, मर्यादा निष्ठा संघ निष्ठा और गुरु निष्ठा का सत्व दिया। इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने अनेकानेक कठिनाईयों और परिषहों को सहा। उनका साध्य था वीतरागता, संकल्प था सत्य की खोज ,साधना थी साधुता की शुचिता । उनका हर श्वास अध्यात्म से अनुप्राणित था।

इस अवसर पर मुनि भव्य कुमार जी ने उनके जीवन से जुड़े अनेक पहलुओं को प्रकट करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु श्रुत के पारगामी पुरुष थे। उन्होंने धर्म और तत्व की सम्यक् प्ररूपणा कर अध्यात्म जगत को नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

भिक्षु चरमोत्सव पर अपनी प्रस्तुति देते हुए मुनि जयेश कुमार ने कहा कि आचार्य भिक्षु बॉस नहीं, एक आदर्श लीडर थे। वे केवल आदेश देने में विश्वास नहीं रखते थे, बल्कि स्वयं आदर्श प्रस्तुत करके नेतृत्व करते थे। उनके व्यक्तित्व में आत्म-जागरण, आत्म-नियमन, आत्म-अनुशासन, प्रेरणा, सहानुभूति और दूरदर्शी नेतृत्व जैसे गुणों का अद्भुत समन्वय था। उनका अनुशासन कठोर नियंत्रण पर नहीं, बल्कि मर्यादा, संयम और आत्म-विकास पर आधारित था। वे अपने अनुयायियों को केवल नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित नहीं करते थे, बल्कि उनके भीतर जागरूकता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते थे। उनके जीवन और नेतृत्व में कथनी और करनी की एकरूपता स्पष्ट दिखाई देती थी। यही उनकी नेतृत्व-शैली की सबसे बड़ी विशेषता थी। उनकी मर्यादित अनुशासन शैली ने धर्मसंघ में ऐसा वातावरण निर्मित किया, जहाँ अनुशासन के साथ आत्मीयता, विनय के साथ गरिमा और नियमों के साथ वात्सल्य का संतुलन बना रहा। इसी से इस धर्मसंघ में आज भी श्रद्धा, विनय और वात्सल्य की त्रिवेणी प्रवहमान है।

रात्रि में विशाल धम्म जागरणा का आयोजन हुआ। जिसमें मुनिवरों सह सैंकड़ों भिक्षु भक्तों ने समवेत स्वरों में अपने आराध्य बाबा भिक्षु को भावपूर्ण गीतों के द्वारा श्रद्धा समर्पित की।

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