धरने से शासन तक: दारा सिंह प्रकरण में मोहन माझी सरकार की दोहरी नीति 
अभिषेक जोशी
एक समय विपक्षी दल के नेता के रूप में दारा सिंह की रिहाई की मांग को लेकर धरने पर बैठने वाले मोहन चरण माझी आज ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं। लेकिन उनके नेतृत्व वाली सरकार ने अब उसी दारा सिंह की रिहाई की याचिका खारिज कर दी है। विपक्ष की सीट से सत्ता के सिंहासन तक की यह यात्रा एक गंभीर राजनीतिक सवाल खड़ा करता है—क्या नीति बदल गई या राजनीतिक सुविधा के अनुसार दृष्टिकोण बदल गया?

दारा सिंह वर्ष 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं। उनकी समयपूर्व रिहाई की याचिका पर राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के समक्ष विचार किया गया था। 31 अगस्त को हुई बैठक में बोर्ड ने इस चरण में उनकी रिहाई की सिफारिश नहीं की। बोर्ड ने उस रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसमें बताया गया था कि केंदुझर जिला जेल के बाहर लगभग 200 से 250 लोग एकत्र हुए थे और उत्तेजक नारे लगाए गए थे।
लेकिन यहां मूल प्रश्न यह है—क्या कानून, न्याय और सामाजिक शांति के मापदंड सत्ता में आने के बाद अचानक बदल जाते हैं? विपक्ष में रहते हुए जिस मांग को न्याय का प्रश्न बताकर उठाया गया था, सत्ता में आने के बाद उसी मामले को कानून-व्यवस्था और संभावित साम्प्रदायिक प्रतिक्रिया के आधार पर देखा जा रहा है। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच स्पष्ट सामंजस्य दिखाई नहीं देता।

विपक्षी दलों में रहने वाले नेताओं को सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाने, धरना देने और जनमत तैयार करने का अधिकार होता है। लेकिन जब वही नेता शासन की जिम्मेदारी संभालते हैं, तब उन्हें समान कानून, न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेना पड़ता है।
यदि मुख्यमंत्री के रूप में मोहन माझी का मत है कि दारा सिंह की रिहाई से कानून-व्यवस्था और सामाजिक शांति प्रभावित हो सकती है, तो विपक्ष में रहते हुए उन्होंने इस आशंका को क्यों महसूस नहीं किया? और यदि उस समय रिहाई की मांग न्यायसंगत थी, तो आज वही मांग अन्यायसंगत कैसे हो गई?
राजनीति में विचार बदलना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन विचार परिवर्तन के लिए तार्किक और पारदर्शी स्पष्टीकरण आवश्यक है। अन्यथा जनता के मन में यह धारणा मजबूत होगी कि चुनाव से पहले भावनाओं को भड़काने के लिए एक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है और सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक जिम्मेदारी के नाम पर दूसरी भाषा बोली जाती है।
दारा सिंह का मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अत्यंत खतरनाक है। किसी भी अपराधी का समर्थन या विरोध उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि कानून, न्याय और मानवीय मूल्यों के आधार पर होना चाहिए।
स्टेन्स हत्याकांड ओडिशा के सामाजिक इतिहास की एक अत्यंत संवेदनशील घटना है। इससे जुड़े प्रत्येक प्रशासनिक और कानूनी निर्णय का पारदर्शी, निष्पक्ष और न्यायसंगत होना आवश्यक है। किसी भी दल, संगठन या धार्मिक पहचान के दबाव में निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
इसी प्रकार, यदि जेल के बाहर 200 से 250 लोगों के एकत्र होने की घटना को आधार बनाकर रिहाई की याचिका खारिज की गई है, तो सरकार को स्पष्ट करना होगा—क्या यह कानूनी मापदंड था या राजनीतिक और प्रशासनिक सुविधा का एक बहाना? ऐसी खबरें सामने आई हैं कि बोर्ड ने स्वयं जिला प्रशासन की रिपोर्ट को अस्पष्ट और अपूर्ण बताया था।
इस प्रकरण में जनता को यह जानने का अधिकार है—
विपक्ष में रहते हुए मुख्यमंत्री ने दारा सिंह की रिहाई के लिए धरना क्यों दिया था?
आज सरकार का निर्णय उस समय की मांग से अलग क्यों है?
यदि विचार बदला है, तो उसका आधार क्या है?
क्या यह निर्णय समान कानूनी मापदंडों के आधार पर लिया गया है?
लोकतंत्र में सरकार निर्णय ले सकती है, लेकिन उस निर्णय का तर्क जनता को बताना भी सरकार की जिम्मेदारी है। अन्यथा शासक के पुराने भाषणों और वर्तमान निर्णयों के बीच की दूरी को जनता ‘दोहरी राजनीति’ के रूप में समझेगी।
दारा सिंह की रिहाई हो या न हो—इसका निर्णय कानून और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। लेकिन धार्मिक भावनाओं को चुनावी राजनीति का हथियार बनाकर बाद में सत्ता में आने के बाद उससे दूरी बना लेना जनता के जनादेश का अनादर है।
विपक्ष की सीट पर धरना और सत्ता की कुर्सी पर अस्वीकृति—इस विरोधाभास का जवाब मोहन माझी सरकार को देना होगा। हिंदू भावनाएं हों या किसी अन्य समुदाय की भावनाएं—उनका राजनीतिक इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित करना उचित नहीं है। शासन में पारदर्शिता, न्याय और जवाबदेही ही आवश्यक है।
अभिषेक जोशी,
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
मुख्य, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना।

