पूर्णावतार माने जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था। उन्हें भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। इसी कारण प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 04 सितंबर को मनाई जा रही है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल से ही अपने असाधारण कार्यों द्वारा भक्तों के संकट दूर किए और धर्म की स्थापना का संदेश दिया। इसलिए भारत के मंदिरों तथा धार्मिक संस्थाओं में जन्माष्टमी का उत्सव अत्यंत श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। विभिन्न प्रांतों में इसे मनाने की परंपराएँ अलग-अलग हैं; फिर भी सभी भक्त इस पर्व को भक्ति-भाव से मनाते हैं।
आइए, इस पावन पर्व के
आध्यात्मिक महत्त्व तथा उपासना की विधि को समझते हैं।
*श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का आध्यात्मिक महत्त्व*
जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण तत्त्व सामान्य दिनों की अपेक्षा अत्यधिक सक्रिय रहता है। इस दिन ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का नामजप तथा श्रीकृष्ण की भावपूर्ण उपासना करने से श्रीकृष्ण तत्त्व का अधिक लाभ प्राप्त होता है।

*जन्माष्टमी कैसे मनाएँ?*
इस दिन श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास रखते हैं। मध्यरात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसके पश्चात प्रसाद ग्रहण कर उपवास समाप्त किया जाता है। कुछ स्थानों पर अगले दिन दही-काला का प्रसाद ग्रहण कर उपवास पूर्ण करने की परंपरा है।
*श्रीकृष्ण पूजन का समय*
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए पूजन की आवश्यक सामग्री एवं तैयारी पहले से कर लेनी चाहिए। जन्म के समय पालना सजाकर बालकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
*श्रीकृष्ण पूजन की विधि*
१. मूर्ति अथवा चित्र का पूजन
श्रीकृष्ण जन्म के पालना-गीत के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र का श्रद्धापूर्वक पूजन करें।
२. भगवान श्रीकृष्ण की षोडशोपचार पूजा करें।
३. यदि षोडशोपचार पूजा संभव न हो, तो पंचोपचार पूजा करें। इसमें गंध, हल्दी- कुमकुम, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य अर्पित करें।
नैवेद्य में दही, पोहे और मक्खन अर्पित कर भगवान की आरती करें। पूजन में गोपीचंदन का गंध अनामिका उंगली से लगाएँ। हल्दी पहले और उसके पश्चात कुमकुम अंगूठे एवं अनामिका की चिमटी से चरणों पर अर्पित करें। इस प्रकार की मुद्रा अनाहत चक्र को जागृत कर भक्ति-भाव बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।
*तुलसी अर्पित करने का महत्त्व*
तुलसी में श्रीकृष्ण तत्त्व प्रचुर मात्रा में माना जाता है। काली तुलसी श्रीकृष्ण के मारक तत्त्व तथा हरी तुलसी तारक तत्त्व की प्रतीक मानी जाती है।
*फूल अर्पित करना*
कृष्णकमल के पुष्प श्रीकृष्ण तत्त्व को अधिक आकर्षित करने वाले माने जाते हैं। इसलिए इन्हें 3 अथवा 3 के गुणक में, लंबगोल आकार में अर्पित करें।
*गंध एवं धूप*
तारक तत्त्व के लिए चंदन, केवड़ा, चंपा, चमेली, जाई तथा अंबर की सुगंधित धूप, जबकि मारक तत्त्व के लिए हिना एवं दरबार की सुगंधित धूप अर्पित करने की परंपरा है।
*मानस पूजा*
यदि किसी कारणवश प्रत्यक्ष पूजा करना संभव न हो, तो मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए सभी उपचार भावपूर्वक अर्पित करें। श्रद्धा और भक्ति से की गई मानस पूजा भी साधना का एक मार्ग है।
*पूजन के पश्चात नामजप करें*
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का अधिकाधिक नामजप करें। पूजा, आरती और भजन जैसी उपासना -पद्धतियों से देवता के तत्त्व का लाभ प्राप्त होता है; परंतु इनपर स्थल और काल की मर्यादा होती है। देवता के तत्त्व का निरंतर लाभ प्राप्त करने के लिए निरंतर नामस्मरण आवश्यक है। ऐसी निरंतर साधना का सरल एवं प्रभावी माध्यम नामजप है। कलियुग में नामजप को सरल एवं श्रेष्ठ साधना माना गया है।
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।*
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥*
कलिसंतरणोपनिषद् में इस महामंत्र का उल्लेख मिलता है। इसे हरिनामोपनिषद् भी कहा जाता है। इस मंत्र का जप करने से साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सहायता मिलती है तथा माया के आवरण से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
*भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें*
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया है—
‘न मे भक्तः प्रणश्यति।’
अर्थात् ‘मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।’
इस वचन का स्मरण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें—
*‘हे श्रीकृष्ण! अर्जुन के समान मेरे मन में भी निस्सीम भक्ति उत्पन्न हो और आपकी भक्ति एवं साधना निरंतर बनी रहे।’*
*भगवान श्रीकृष्ण का अनादर रोकें!*
वर्तमान समय में विभिन्न माध्यमों से देवी-देवताओं का अनादर किए जाने की घटनाएँ सामने आती हैं। व्याख्यानों, पुस्तकों, नाटकों, चलचित्रों, विज्ञापनों तथा विभिन्न उत्पादों के माध्यम से देवताओं का अनुचित चित्रण अथवा अनादर किया जाता है।
ऐसे विज्ञापनों, उत्पादों एवं कार्यक्रमों का शांतिपूर्ण एवं वैधानिक रूप से बहिष्कार करें। यदि किसी माध्यम से धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं, तो संबंधित संस्था अथवा प्रशासन के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराएं। साथ ही, देवी-देवताओं की वेशभूषा धारण कर भीख माँगने जैसी गतिविधियों के प्रति भी समाज में जागरूकता उत्पन्न करें।
इस जन्माष्टमी केवल उत्सव न मनाएँ, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, नामजप और धर्माचरण का संकल्प लेकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
संदर्भ – सनातन निर्मित पुस्तक ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

