सभी धर्मों का मूलमंत्र मूलतः एक है – मानवता, करुणा, समानता और परस्पर प्रेम
अभिषेक जोशी
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
अध्यक्ष, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना
आज की दुनिया में सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के कारण मानव समाज टूट-सा गया है। हर ओर धर्म, जाति और समुदाय के नाम पर अशांति दिखाई देती है। लेकिन हिंदू, इस्लाम, ईसाई, सिख आदि सभी महान धर्मों का मूल संदेश मूलतः एक ही है – मानवता, करुणा, समानता और परस्पर प्रेम।
एक ही ईश्वर है, पर उसके अनेक नाम और अनेक मार्ग हैं; सभी मनुष्य समान हैं। कोई भी ऊँचा या नीचा नहीं है। जिन शास्त्रों में यह संदेश मिलता है, वे वास्तव में मानवीय मूल्यों की महान पाठशालाएँ हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष सभी प्राणियों को समदृष्टि से देखता है – ब्राह्मण हो, गाय हो, हाथी हो, कुत्ता हो या तथाकथित अस्पृश्य व्यक्ति हो – सभी के भीतर एक ही आत्मा का वास है। यह महान वाणी सिखाती है कि जाति, वर्ण, धन, पद आदि से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता; मनुष्यता का गौरव ही वास्तविक मूल्य है। गीता आज भी हमें यह संदेश देती है – “समान दृष्टि से देखो, समान भाव से सोचो, और समान करुणा से सभी को समझो।”
तुलसीदास की रामचरितमानस में राम को समस्त प्राणियों का आश्रय रूप बताया गया है। जहाँ सिंह, वानर, स्त्री–पुरुष, ऊँच–नीच सभी राम-भक्ति में समान स्थान पाते हैं, वहाँ मानव समाज की समानता का सुंदर चित्र उभरता है। रामचरितमानस हमें सिखाती है कि धर्म का वास्तविक फल मानव समाज में शांति और प्रेम की स्थापना है। जिस किसी मानव-हृदय में दया, सत्य, धर्म, क्षमा और न्याय का प्रकाश है, वही व्यक्ति सच्चा भक्त है – जाति या रीति-नियम उसे बाधित नहीं कर सकते।
इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अल्लाह (परमेश्वर) ने नर–नारी, विभिन्न जातियों, भाषाओं और समूहों से सभी को समान रूप से बनाया है। मनुष्यों में श्रेष्ठता धन, पद, जाति या रंग में नहीं, बल्कि ईश्वर-भय, न्याय, दया और परस्पर सम्मान में निहित है। कुरान की एक प्रसिद्ध आयत कहती है: “हे लोगों! हमने तुम्हें पुरुष और स्त्री से उत्पन्न किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और समूहों में विभाजित किया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। तुममें सबसे श्रेष्ठ वह है जो अधिक ईश्वरभय और न्यायपरायण है।” यह आयत सभी धर्मों के मानवीय मूल्यों को बल देती है।
ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ बाइबिल में प्रभु यीशु ने कहा है, “अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करो।” अर्थात् किसी भी मनुष्य को देखकर उसे अपने परिवार, अपने भाई–बहन के समान समझो; घृणा, प्रतिशोध या भेदभाव का कोई कारण नहीं है। बाइबिल यह भी स्थापित करती है कि सभी मनुष्य ईश्वर की छवि में सृजित हुए हैं; इसलिए किसी भी मानव का अपमान करना या उसके अधिकार छीनना ईश्वर के नियम का उल्लंघन है। इस दृष्टि से प्रेम, दया, क्षमा और न्याय ही सच्चे धर्म के लक्षण हैं।
सिख धर्म के गुरु ग्रंथ साहिब में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पृथ्वी के सभी मनुष्य समान हैं – जाति, धन, पद, रंग या लिंग का भेदभाव ईश्वर की दृष्टि में कोई अर्थ नहीं रखता। गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार, “सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र-पुत्रियाँ हैं, सभी एक ही ईश्वर के परिवार का हिस्सा हैं।” इसलिए यदि कोई दूसरे का अपमान करता है, तो वह ईश्वर का अपमान करता है। गुरु ग्रंथ साहिब हमें सिखाता है कि सेवा, सत्य, दया, अभिमान का त्याग और परस्पर समभाव ही सच्ची धार्मिकता है।
इन सभी पवित्र ग्रंथों से एक ही सामान्य संदेश मिलता है:
सभी मनुष्य समान हैं; जाति, धर्म, धन, रंग या पद के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं है। ईश्वर सभी के भीतर विद्यमान हैं, इसलिए हर मानव-शरीर पवित्र और सम्माननीय है। प्रेम, दया, सत्य, न्याय और क्षमा ही सभी धर्मों की मूल आधारशिला हैं।
इन शास्त्रों की महान वाणी को आज भी अपने दैनिक जीवन में उतारना हमारी जिम्मेदारी है। धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि मानवता के नाम पर हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। घृणा और विभेद को दूर करना चाहिए। वह दिन जब हर व्यक्ति दूसरे को यह समझकर देखेगा कि “यह मेरा भाई है, यह मेरी बहन है, यह मेरा परिवार है”, तभी सभी धर्मों का मूलमंत्र फलित होगा और हमारा समाज शांति, समभाव और प्रेम में जी सकेगा।
जय श्री जगन्नाथ।
अभिषेक जोशी,
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
अध्यक्ष, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना

