#मैं_काशी_का_वासी_हूँ— यह एक शास्त्रीय उद्घोष है। “मैं काशी का वासी हूँ”—यह वाक्य केवल भौगोलिक परिचय नहीं, बल्कि सनातन चेतना की घोषणा है। काशी कोई सामान्य नगरी नहीं, अपितु #अविनाशी_ब्रह्म_क्षेत्र_मोक्ष की राजधानी और शिव का नित्य निवास है।
(१) काशी का शास्त्रीय स्वरूप–
शास्त्र काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं—अर्थात् जिसे भगवान् शिव ने कभी नहीं छोड़ा।
#स्कन्दपुराण (काशीखण्ड) में स्पष्ट है— “अविमुक्तं तु यत् क्षेत्रं सर्वपापप्रणाशनम्।” अर्थात् काशी ऐसा क्षेत्र है, जहाँ समस्त पाप स्वतः नष्ट हो जाते हैं। यहाँ की भूमि साधारण नहीं है, यह चिन्मयी भूमि है।
(२) काशी और शिव का नित्य सम्बन्ध– काशी में शिव केवल पूज्य देव नहीं, बल्कि नगराधिपति (विश्वनाथ) हैं। “काश्यां हि शिवः साक्षान्नित्यं वसति शंकरः।” (स्कन्दपुराण)
अतः “मैं काशी का वासी हूँ” यह कहना, वास्तव में यह कहना है कि “मैं शिव की सन्निधि में जीता हूँ।”
(३) काशी का तात्पर्य ज्ञान की जन्मभूमि है। काशी को ज्ञान की राजधानी कहा गया है— वेद, उपनिषद्, व्याकरण, दर्शन, तंत्र, योग इन सभी की जीवंत परंपरा आज भी काशी में प्रवाहित है। बृहदारण्यक उपनिषद् की गूढ़ शिक्षाएँ हों या शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य की परंपराएँ हों— सबका स्पंदन काशी में मिलता है।
(४) काशी में मृत्यु का रहस्य–
काशी में मरना शास्त्रों में महाभाग्य कहा गया है। “अन्ते काशीपुरी मरणं मुक्तिदं नात्र संशयः।” (काशीखण्ड) यहाँ शिव स्वयं तारक मंत्र का उपदेश देते हैं– इसलिए काशी मोक्ष-यंत्र है।
(५) काशी का वासी होना मतलब कई जन्मों की साधनाओं, उपासनाओं, तपस्याओं का फल है। काशी में रहना केवल निवास नहीं, एक निरंतर फल प्राप्ति युक्त साधना है। गंगा के तट पर चेतना का प्रवाह घाटों पर वैराग्य का दर्शन, श्मशान में वैदिक सत्य की शिक्षा की दिव्य नगरी है। यह #विश्वपैतृक_नगर हमें सिखाता है— अनित्यता में नित्य को देखना।
(६) “मैं काशी का वासी हूँ”— इसका आन्तरिक अर्थ (इसका गूढ़ अर्थ है) — मैं मृत्यु से भयभीत नहीं। मैं शिव-तत्त्व में स्थित हूँ। मैं माया से ऊपर उठने का पथ जानता हूँ। काशी का वासी होना अहंकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है— सत्य, करुणा और विवेक का।
#उपसंहार– “मैं काशी का वासी हूँ”— यह वाक्य एक जीवन-दर्शन, शिव-स्मृति और मोक्ष-पथ है। जो काशी में रहता है, उसे काशी अपने भीतर भी बसानी होती है। जहाँ शिव की चेतना जागृत हो— “वही काशी है।”
— राजेश्वराचार्यः संस्कृतम्
वाराणसी/दिल्ली

