श्रावण शुक्ल सप्तमी को, अर्थात् इस वर्ष 31 जुलाई को संत गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती है। ये उत्तरप्रदेश के महान संत हैं। उन्हें महर्षि वाल्मीकि ऋषि का अवतार कहा जाता है। ये रामचरितमानस, अयोध्याकांड, सुन्दरकांड इत्यादि महान आध्यात्मिक ग्रंथों के रचयिता हैं। उनके पावन जयंती के अवसर पर संक्षेप में उनका चरित्र जान लेते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास :
जन्म : ई. स. 16 अगस्त 1511 (विक्रम संवत 1568)
देहत्याग : ई. स. 30 जुलाई 1623 (विक्रम संवत 1680)
उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर में माता हुलसी के घर श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास जी का जन्म हुआ। वे माँ के गर्भ में बारह महीने रहे। जन्म के समय मूल नक्षत्र था, मुख में बत्तीस दाँत थे, कद पाँच वर्ष के बालक जैसा था। जन्म लेते समय वह बालक रोया नहीं, अपितु उसके मुख से ‘राम’ नाम निकला। ऐसे अद्भुत किंतु अशुभ लक्षण देखकर माता-पिता ने उस बालक को स्वर्णदान के साथ चुनिया नाम की दासी को सौंप दिया। बाद में उसकी माता हुलसी का भी निधन हो गया। चुनिया दासी ने पाँच वर्षों तक उसका पालन-पोषण किया। फिर चुनियाका भी निधन हो गया। वह बालक एकाकी जीवन जी रहा था, तब स्वयं जगज्जननी पार्वती ब्राह्मण स्त्री के वेश में आकर उस बालक को नरसिंहदास नामक साधु को सौंप गई। नरसिंहदास ने उसका पालन-पोषण किया। उपनयन करने के बाद उस बालक का नाम रामबोला रखा गया। वही तुलसीदास हैं।
अध्ययन: अयोध्या में बारह वर्षों तक श्रीगुरु के सान्निध्य में रहकर उन्होंने वेद-शास्त्रों का अध्ययन पूर्ण किया। बाद में वे हस्तिनापुर लौटे। वहाँ उनकी अपने पिता आत्माराम दुबे से भेंट हुई। आत्माराम अकबर दरबार में थे। एक बार वे तुलसीदास को अकबर के पास ले गए। अकबर को तुलसीदास बहुत प्रिय हो गए। बादशाह उन्हें शिकार पर भी अपने साथ ले जाया करता।
विवाह और वैराग्य: तुलसीदास के पिता आत्माराम ने उनका विवाह एक धनाढ्य व्यक्ति की कन्या से धूमधाम से किया, उसका नाम रत्नावली था। दोनों पति-पत्नी को एक-दूसरे से अत्यधिक प्रेम हो गया। तुलसीदास को रत्नावली के बिना एक पल भी चैन नहीं मिलता।
एक दिन जब तुलसीदास अकबर के साथ दूर देश गए हुए थे, रत्नावली बुलावे पर अपने मायके चली गई। तुलसीदास लौटे तो उन्हें बताया गया कि रत्नावली मायके गई हैं। वे तुरंत ससुराल की ओर निकल पड़े। वहाँ पहुँचे तो दो प्रहर रात बीत चुकी थी। घर के सब लोग दरवाजे बंद कर सो गए थे। तुलसीदास सोचने लगे कि भीतर कैसे प्रवेश करें? वे रत्नावली से मिलने को अत्यंत व्याकुल थे। उन्हें खिड़की पर लटकता एक साँप दिखाई दिया। उसी को रस्सी समझकर पकड़कर वे भीतर चले गए। घर के लोग जाग गए।तुलसीदास के आने की खबर रत्नावली को उसकी माँ ने दी। वह तुलसीदास के पास आई और बोली, “सभी दरवाज़े बंद थे, आप भीतर कैसे आए?”
तुलसीदास बोले, “तुमने जो रस्सी लटकाकर रखी थी, उसे पकड़कर मैं आया।” यह सुन रत्नावली को आश्चर्य हुआ। वह खिड़की पर जाकर देखती है, तो एक बड़ा साँप लटकता हुआ दिखाई दिया। तब वह तुलसीदास से बोली, “प्राणनाथ, आप मुझसे जितना प्रेम करते हैं, उतना यदि श्रीराम से करें, तो आपके जीवन का सार्थक हो जाएगा।” यह सुनकर तुलसीदास विरक्त हो गए। उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे वहीं से निकल पड़े और आनंदवन पहुँचे। वहाँ उन्होंने बारह वर्षों तक तपस्या की। फिर वे रामकथा कहने लगे।
राम-दर्शन की उत्कंठा: एक बार तुलसीदास को एक पिशाच मिला। पिशाच ने पूछा, “तुझे क्या चाहिए?” तुलसीदास बोले, “राम का दर्शन करा दो।” यह सुनकर पिशाच आगे-आगे चलने लगा। कुछ दूर जाकर बोला, “तू जिस स्थान पर पुराण सुनने जाता है, वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण हाथ में लाठी लेकर सबसे पहले आकर बैठता है और सबके जाने के बाद निकलता है – वही तुझे राम का दर्शन कराएगा। वह वास्तव में हनुमान हैं।” इतना कहकर पिशाच अदृश्य हो गया।
अगले दिन पुराण समाप्त होने पर वह ब्राह्मण जा ही रहा था कि तुलसीदास ने उसे मार्ग में रोककर साष्टांग नमस्कार किया। ब्राह्मण बोला, “मैं तो एक गरीब ब्राह्मण हूँ, तुझे देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं।” तुलसीदास बोले, “आप हनुमान हैं। श्रीराम के दर्शन आप ही मुझे करा सकते हैं।”
हनुमान ने तुलसीदास को पहचान लिया की यह वाल्मीकि का ही अवतार है। उन्होंने तुलसीदास को प्रेमपूर्वक आलिंगन दिया। जल्दी ही श्रीराम के दर्शन कराने का आश्वासन देकर वे अदृश्य हो गए।
हनुमान ने श्रीरामचंद्र से कहा, “आपकी आज्ञा से वाल्मीकि ने तुलसीदास रूप में अवतार लिया है। वे आपके दर्शन के लिए अत्यंत व्याकुल हैं।” तब प्रभु श्रीराम ने तुलसीदास को वाल्मीकि द्वारा वर्णित रूप में दर्शन दिए और उन्हें आलिंगन कर मस्तक पर हाथ रखकर अदृश्य हो गए।
रचनाएं: संत तुलसीदास को कवि के रूप में हिंदी साहित्य में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। मध्यकालीन भारत में संत तुलसीदास जैसा दूसरा कोई लोकप्रिय कवि नहीं हुआ। उनकी रचनाओं ने गरीब की झोपड़ी से लेकर अमीर के महल तक समान रूप से प्रवेश किया है।
वे रामचरितमानस, अयोध्याकांड, सुंदरकांड आदि महान आध्यात्मिक ग्रंथों के रचयिता हैं। “हनुमान चालीसा” की रचना तुलसीदास ने की। हनुमान ने उन्हें विनयपद लिखने की आज्ञा दी, जिसे स्वीकार कर उन्होंने ‘विनय-पत्रिका’ नामक श्रेष्ठ काव्य रचा। संत तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण को हिंदी रूप में प्रस्तुत किया। वही है तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस। ई. स. 1574 (संवत 1631) के रामनवमी के दिन संत तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस लिखना प्रारंभ किया। दो वर्ष, सात महीने, सत्ताईस दिनों में यह रचना पूर्ण हुई। ई. स. 1576 (संवत 1633) के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में श्रीराम-सीता विवाह-दिवस पर सातों कांड पूर्ण हो गए।
भगवान श्रीराम की आज्ञा से तुलसीदास काशी पहुँचे और श्री विश्वनाथ व अन्नपूर्णा को अपना काव्य सुनाया। ग्रंथ को विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में रख दिया। अगले दिन उस ग्रंथ पर लिखा था – “सत्यं शिवं सुंदरम”, नीचे ‘श्री शंकर’ लिखा था।
प्रत्यक्ष भगवान ही रक्षक: तुलसीदास की इस काव्य को नष्ट करने का कुछ दुष्टों ने प्रयास किया। उनके घर चोर भी भेजे गए। परंतु वहाँ दो धनुर्धारी पहरा दे रहे थे। यह देखकर चोर भाग गए। बाद में तुलसीदास ने वह ग्रंथ अपने घनिष्ठ मित्र टोडरमल के पास रख दिया।
अवतार कार्य: गोस्वामी तुलसीदास ने भारत भ्रमण किया। तत्कालीन हिन्दू समाज पर हुए आक्रमणों को देखकर वे अत्यंत दुःखी हुए। उन्होंने भारत के सभी राजाओं को एकत्र करने का प्रयास किया। सामान्य जनों में भी उन्होंने जनजागृति की। तुलसीदास ने रामलीला नाट्य-प्रकार का आरंभ किया।
तुलसीदास की शिक्षाएं: तुलसीदास की भक्ति में विनय को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। उनका विश्वास था कि अहंकार नष्ट होकर विनम्र बने बिना भक्ति का आनंद अनुभव नहीं किया जा सकता। इस अहंकार के नाश के लिए आत्मपरीक्षण कर अपने दोषों का नाश करना और गुणों की वृद्धि करना आवश्यक है। भक्ति के लिए सत्संग, ज्ञान, वैराग्य, तप, संयम, श्रद्धा, प्रेम, भगवतकृपा, शरणागति इन बातों को उन्होंने महत्वपूर्ण माना।
एक प्रकार से संत गोस्वामी तुलसीदास का भक्त एक आदर्श मानव का रूप धारण करता है।
इसी प्रकार की साधना सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले ने बताई है। उनके अनुसार, सनातन संस्था के साधक प्रयत्नपूर्वक आध्यात्मिक प्रगति भी कर रहे हैं।
श्रीराम चरणों में विलीन: ई. स. 30 जुलाई 1623 (विक्रम संवत 1680) संत तुलसीदास ने अस्सी घाट पर श्रीराम नाम का उच्चारण करते हुए देह त्याग दिया।

