गोवा – पीढ़ियों से, पितृपक्ष को पूर्वजों (पितरों) का स्मरण करने और उनके लिए श्राद्ध विधि करने के काल के रूप में जाना जाता है। पूर्वजों के आध्यात्मिक कल्याण और सद्गति के लिए की जाने वाली पारंपरिक श्राद्ध विधि क्या इसे करने वाले व्यक्ति और उसके पूर्वजों में मापने योग्य ऊर्जा परिवर्तन ला सकती है? महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा द्वारा किए गए एक अध्ययन से अत्यंत असाधारण निष्कर्ष सामने आए हैं।
इस अध्ययन में, चार श्राद्धकर्ताओं ने (अपने परिवार के सदस्यों के साथ) अपने पितरों के लिए श्राद्ध विधि की और दो पुरोहितों ने विधि संपन्न कराई। शोधकर्ता दल ने ‘ऑरा एंड एनर्जी स्कैनर’ का उपयोग करके विधि से पहले और विधि के बाद श्राद्धकर्ता व्यक्तियों, पुरोहितों और विधि के घटकों के सूक्ष्म ऊर्जा के औरा (प्रभामंडल) के आंकड़े दर्ज किए।
विशेष बात यह रही कि चारों श्राद्धकर्ताओं में नकारात्मक ऊर्जा में लगभग 50% की कमी आई और सकारात्मक ऊर्जा में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई। चौथे श्राद्धकर्ता की पत्नी के नकारात्मक ऊर्जा के औरा में 60% की भारी कमी आई, जबकि उसके सकारात्मक ऊर्जा के औरा में 100% से अधिक की वृद्धि हुई। विधि में शामिल हुए पुरोहितों के सकारात्मक ऊर्जा के औरा में विधि के बाद औसतन 55% से अधिक की वृद्धि हुई। भगवान दत्तात्रेय के चित्र की सकारात्मक ऊर्जा में विधि के बाद 47% की उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।

शोधकर्ताओं ने विधि की सामग्रियों, जैसे पिंड, दर्भ और नैवेद्य में भी महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए। पितरों को अर्पित किया गया अन्न (पिंड – तिल मिला हुआ चावल) और कुश में विधि के बाद क्रमशः 25 मीटर और 19 मीटर से अधिक नकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि देखी गई। देवताओं को अर्पित किए गए नैवेद्य की सकारात्मक ऊर्जा में श्राद्ध के बाद 144% की हैरान कर देने वाली वृद्धि हुई। एक पूर्वज के चित्र में नकारात्मक ऊर्जा के औरा में 54% की कमी पाई गई और उसमें सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता हुआ देखा गया।
ये उल्लेखनीय आंकड़े इस विधि के प्राचीन लेकिन वैज्ञानिक आधार का प्रमाण देते हैं। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि उसके परिवार के सदस्यों को भी आध्यात्मिक लाभ मिलता है। यदि यह विधि भावपूर्वक की जाए, तो प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा अधिक होती है। भगवान दत्तात्रेय पितरों को गति देने वाले देवता हैं। श्राद्ध स्थल पर उनका चित्र रखकर उनकी भावपूर्वक पूजा करने से उनका तत्व कार्यरत होता है; जिसका लाभ परिवार के सभी सदस्यों को मिलता है। मंत्रोच्चार के साथ पितरों को अर्पित किया गया पिंड उन्हें आकर्षित करता है और तृप्त करता है, जिससे उन्हें परलोक के मार्ग में गति मिलने में सहायता होती है और उनके कारण वंशजों को होने वाला कष्ट कम होता है।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि श्राद्ध विधि करने वाले वंशज, उनका परिवार, पुरोहित और पूर्वज – इन सभी को आध्यात्मिक लाभ होता है, जो हिंदू परंपरा में इस विधि के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करता है। श्राद्ध के साथ-साथ, आध्यात्मिक लाभ बढ़ाने के लिए पितृ पक्ष के दौरान प्रतिदिन एक से दो घंटे “ॐ ॐ श्री गुरुदेव दत्त ॐ” का नामजप करना चाहिए।
— श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा

