कटक, जैन परम्परा में पर्युषण पर्व का अत्यंत विशिष्ट एवं आध्यात्मिक महत्व है। ‘पर्युषण’ का अर्थ है—चारों ओर से सिमटकर एक स्थान पर अवस्थित होना, अर्थात् इन्द्रिय जगत से आत्मजगत की ओर उन्मुख होना। इसका फलितार्थ है—कषायों का उपशमन, भौतिक प्रवृत्तियों से विरक्ति, आत्मसाधना के लिए पुरुषार्थ तथा अतीत की स्खलनाओं, प्रमादों और भूलों का सिंहावलोकन। पर्युषण आत्मनिरीक्षण, आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का ऐसा पर्व है, जो व्यक्ति को बाह्य आडम्बर से हटाकर अपने अंतर्मन की ओर यात्रा करने की प्रेरणा देता है।
पर्युषण काल में उपशमभाव, तपोभाव, साधर्मिक भाव, उपासना भाव एवं संयमभाव का निरंतर विकास इस पर्व की आध्यात्मिक महत्ता को प्रत्यक्ष रूप से मुखर करता है। इन्हीं भावों को अभिव्यक्त करते हुए मुनि मोहजीत कुमार जी ने तेरापंथ भवन, कटक में विशाल जनमेदिनी के समक्ष पर्युषण पर्व की आध्यात्मिक प्रासंगिकता पर प्रभावशाली उद्बोधन दिया।
पर्युषण महापर्व आराधना के प्रथम दिवस को ‘खाद्य संयम दिवस’ के रूप में मनाया गया। इस संदर्भ में मुनि जयेश कुमार जी ने कहा कि आहार जीवन की अनिवार्यता है और जो अनिवार्य है, उसमें विवेक एवं संयम का होना अत्यंत आवश्यक है। भोजन का लक्ष्य केवल स्वाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और साधना होना चाहिए। आहार का संयम शारीरिक, मानसिक, भावात्मक एवं आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण आधार है। जीवन की सुदीर्घ यात्रा में खान-पान का संयम व्यक्ति के स्वास्थ्य, विचारों और व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालता है। भोजन में जहां भी असंयम प्रवेश करता है, वहीं अनेक प्रकार की विकृतियों के जन्म की सम्भावना बढ़ जाती है। अतः आहार में विवेक, मर्यादा और संयम का समावेश स्वस्थ एवं संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है।
‘तीर्थंकर जीवन-दर्शन’ के अंतर्गत मुनि जयेश कुमार जी ने तीर्थ एवं तीर्थंकर की महत्ता पर विशेष प्रस्तुति दी।
वहीं मुनि भव्य कुमार जी ने उत्तराध्ययन सूत्र के ‘चित्त संभूति’ प्रसंग को प्रभावपूर्ण शैली में प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
इससे पूर्व प्रातः 6 बजे से तेरापंथी सभा, तेरापंथ महिला मंडल एवं तेरापंथ युवक परिषद, कटक के संयुक्त सहभागित्व से नमस्कार महामंत्र के सप्त दिवसीय अखंड जप का शुभारम्भ हुआ।

