भारत के अनेक बड़े मीडिया हाउस पिछले अनेक वर्षों से भारत विरोधी, सनातन विरोधी होरखे हैं, ओड़िशा के कुछ छोटे मीडिया वाले चवन्नी होरखे हैं 

भारत के अनेक बड़े मीडिया हाउस पिछले अनेक वर्षों से भारत विरोधी, सनातन विरोधी होरखे हैं, ओड़िशा के कुछ छोटे मीडिया वाले चवन्नी होरखे हैं

चौथी , अंतिम कड़ी

नन्द किशोर जोशी

एक्जिक्यूटिव एडिटर

क्रांति ओडिशा मीडिया

 

मैंने पिछले दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनंद बजार पत्रिका जैसे बड़े मीडिया हाउस के बारे में लिखा कि कैसे किसी जमाने में इनमें से अधिकांश मीडिया हाउस राष्ट्रवादी हुआ करते थे और आज के दौर में कैसे ये राष्ट्रविरोधी भूमिका निभा रहे हैं।

 

आज मैं ओडिशा के संदर्भ में लिख रहा हूं। ओडिशा में पिछले कुछ वर्षों तक प्रिंट मीडिया का गढ़ हुआ करता था कटक।इसी कटक शहर में ही आकाशवाणी का केंद्र है यानी सरकारी रेडियो स्टेशन है।कटक में ही पहले सरकारी दूरदर्शन केन्द्र हुआ करता था,आज राजधानी भुवनेश्वर में है।

 

आज भी लोकप्रिय, राष्ट्रवादी ओड़िआ दैनिक समाज कटक से छपता है, इसके अलावा अन्य जगहों से भी छपता है। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बिजु पटनायक ने कटक से ओड़िआ दैनिक कलिंग अखबार निकाला था,1975 के आसपास यह बंद होगया। ओडिशा के एक और मुख्यमंत्री बिरेन मित्र ने भी ओड़िआ दैनिक अखबार जनशक्ति के नाम से कटक से निकाला था,वह भी बंद होगया। इसके अलावा कुछ छोटे मोटे ओड़िआ दैनिक अखबार आज भी कटक से निकलते हैं।

 

इनके अलावा तीन इंग्लिश दैनिक अखबार कटक से आज प्रकाशित होते हैं टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स और हिन्दू।ये तीनों अखबार जगतपुर इंडस्ट्रियल इस्टेट में छपते हैं, लेकिन इनका कार्यालय भुवनेश्वर में है।

 

आज भुवनेश्वर से प्रकाशित बड़े ओड़िआ अखबार ओडिशा के बड़े राजनीतिक घरानों से जुड़े हैं। इनमें प्रमुख हैं धरित्रि , संवाद,समय,प्रगतिवादी इत्यादि। राजनीतिक घरानों से जुड़े होने के कारण आज भी इनकी विचारधारा न्यूज पर कहीं न कहीं प्रभाव डालती है।आज के संदर्भ में इसे स्वाभाविक माना जाता है।

 

भुवनेश्वर चूंकि ओडिशा की राजधानी है , स्वाभाविक तौर पर यहां से नेशनल लेवल के अनेक टिवि चैनल ओड़िआ भाषा में भी न्यूज प्रसारण करते हैं।आज ओडिशा का मीडिया गढ़ कटक से शिफ्ट होकर भुवनेश्वर चला आया है।

 

भुवनेश्वर में अनेक अखबार केवल नाम के दैनिक अखबार हैं।ये अखबार छपते हैं उसी दिन, जिस दिन इन्हें सरकारी विज्ञापन कुछ मिलता है।जिस दिन सरकारी विज्ञापन इन्हें नहीं मिलता,उस दिन ये तथाकथित दैनिक अखबार छपते ही नहीं हैं।

 

भुवनेश्वर में कुछ ऐसे दैनिक अखबार भी छपते हैं सभी भाषा के जिनका कोई स्थायी कार्यालय नहीं है,किराये के मकान में कार्यालय बनाये हैं।अपनी प्रिंटिंग प्रेस भी नहीं है, बाजार में दूसरे की प्रिंटिंग प्रेस में जोब वर्क पर छपवाते हैं।छपवाई अगर 100 कोपी है तो प्रिंटिंग प्रेस से बिल लेते हैं हजारों में,ऐसा इसलिए कि सरकारी संस्थाओं को दिखाना है,खाना पूर्ति के लिए।

 

कुछ ऐसे भी वहां से दैनिक अखबार सभी भाषाओं के तथाकथित तौर पर रोज छपते हैं,जो बाजार में कहीं बड़ी मेहनत, मशक्कत कर के भी ढूंढे नहीं मिलते, अर्थात कभी छपते हैं और कभी कभी नहीं छपते हैं, बाजार में तो बिल्कुल दिखाई नहीं देते सभी भाषाओं के अखबार।

 

कुछेक अखबार ऐसे भी हैं कि रोजाना एक दो दिन की बासी खबरें छापकर जैसे तैसे 10-12 पेज भरते हैं,इधर उधर की बिना किसी मतलब की खबरें छापते रहते हैं। उद्देश्य एक ही है कि जैसे तैसे अखबार चलाना है । अखबार के सहारे अपनी दुकानदारी चलानी है, सरकार से सभी तरह के लाभ उठाने हैं।

 

कुछ दिनों पहले मेरी एक भुवनेश्वर के मित्र संग चर्चा हो रही थी सामाजिक फंक्शन में।मित्र कवि,लेखक, साहित्यकार हैं और समाजसेवा से भी जुड़े हुए हैं।वे बोल रहे थे कि भारत में टिवि चैनल्स ज्यादा से ज्यादा पांच वर्ष और चलेंगे।

 

प्रिंट मीडिया के बारे में बोले कि वहां एक दैनिक अखबार ऐसा है कि उसे भुवनेश्वर के बाजार में कहीं भी ढूंढे नहीं मिलता है।एक अखबार ऐसा भी है कि वहां के किसी बड़े सेठ का कुता अगर मर जाये तो,उसकी न्यूज प्रोमिनेंटलि छपती है।

 

इसतरह भुवनेश्वर से प्रकाशित कुछ अखबारों के बारे में मैंने संक्षिप्त में लिखा है।आज प्रिंट मीडिया यानी अखबार पूरे आउटडेटेड हो गये हैं।टिवि चैनल्स जल्द आउटडेटेड होने वाले हैं। इसीलिए आज भारत में अमेरिका, यूरोप की तर्ज पर सोसयल मीडिया, डिजिटल मीडिया छागया है।

 

ओडिशा,भारत के बड़े बड़े मीडिया हाउस ने इसीलिए अपना अपना एक डिजीटल मीडिया चैनल बना लिया है ज़माने के हिसाब से चलने के लिए। खबरों की दुनिया में बने रहने के लिए।

 

आज प्रिंट मीडिया बैल गाड़ी है,टिवि चैनल्स रेलगाड़ी है , डिजीटल मीडिया हवाई जहाज है।हवाई जहाज जैसे फटाफट आपको मंजिल पर पहुंचाती है, ठीक वैसे ही डिजीटल मीडिया आपको फटाफट खबरें भेजती है। इसलिए आज सभी डिजीटल मीडिया पर ही भरोसा करते हैं,उसी के अनुरूप चलते हैं।

आज जैसे भारत में चवन्नी चलन से बाहर हो गयी है, ठीक इसी तरह भुवनेश्वर से प्रकाशित सभी भाषाओं के कुछ कुछ अखबार चवन्नी बन गये हैं। जैसे चवन्नी को कोई नहीं पूछता है, वैसे सभी भाषाओं के कुछ कुछ अखबारों की हालत होगयी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *