सनातन हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था, जातिवाद नहीं है
अभिषेक जोशी,
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
मुख्य, पतितपावन जगन्नाथ सेवा फ़ाउंडेशन एवं
ओडिशा सुरक्षा सेना
सनातन हिन्दू धर्म का आधार आत्मा, धर्म, नीति और कर्म के मूल्य हैं। प्राचीन सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में जिस प्रकार वर्ण व्यवस्था बनी थी, उसका मूल उद्देश्य समाज में कार्य-विभाजन था — ताकि लोग अपनी योग्यता और शक्ति के अनुसार जीविका चला सकें।
प्राचीन ग्रंथों में वर्णों को चार मुख्य वर्गों में विभक्त किया गया है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। इसका मूल उद्देश्य कार्य-विभाजन था: शिक्षा, रक्षा, व्यापार और सेवा/श्रम। यह उद्देश्य हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था की सच्ची प्रवृत्ति को दर्शाता है, परन्तु आज इसे गलत तरीके से जातिवाद के साथ जोड़ दिया गया है। अब आधुनिक समाज में पारम्परिक वर्ण व्यवस्था आवश्यक नहीं रही क्योंकि आज कार्य के अनेक रास्ते हैं।
धर्मशास्त्रों और ग्रंथों (जैसे भागवत, महाभारत, गीता) में वर्ण को कर्म, कर्तव्य और दायित्व के आधार पर वर्णित किया गया है। यदि प्राचीन धारणा से वर्ण व्यवस्था आरम्भ हुई थी, तो समय के साथ यह नियमों, नियोजित सीमाओं, विवाह-नियमों और विषमताओं के रूप में बदल कर जातिवाद बन गई — जिसे casteism कहा जाता है। समय के साथ जातिवाद ने जड़ पकड़ ली और इससे न्याय व समानता की हानि हुई।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वर्ण व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन करना अत्यन्त विविध कारणों से आवश्यक है: तकनीक, सर्विस इंडस्ट्री, फ्रीलांसिंग, वैश्विक इंटरैक्शन — इन सबका अर्थ है कि लोग अपनी क्षमता, प्रशिक्षण और इच्छानुसार पेशा चुनते हैं; इसलिए प्राचीन वर्ण विभाजन आज के समाज के अनुकूल नहीं रह गया। मुख्यतः समाज धीरे-धीरे शिक्षा, कानून, आर्थिक अवसर और नैतिक परिवर्तन के आधार पर आगे बढ़ रहा है, जिससे जातिगत अवरोध धीरे-धीरे घटेगा। जातिवाद आज के समाज में सफलता और उन्नति का सामाजिक अवरोध बन गया है।
एक वैश्विक उदाहरण के तौर पर आधुनिक समय में जब उत्तर प्रदेश में महा कुम्भ मेला लगता है, तो वहां लाखों सनातनी हिन्दू एकत्र होते हैं; लोग मिलकर गंगा में स्नान करते और प्रार्थना करते हैं — वहां जाति और वर्ण की परवाह नहीं की जाती। महा कुम्भ मेले में विविध श्रेणी, वर्ण और जाति के बहुत से लोग सामूहिक रूप से पवित्र जल में डुबकी लगाकर और मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं। यह दर्शाता है कि सनातन दर्शन का मूल आत्मा और भक्ति का स्वरूप किसी जाति-आधारित नहीं है — जहां साधु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सामान्य लोग समान रूप से भक्ति व्यक्त करते हैं। धर्मग्रंथों में भक्ति और कर्म को प्राथमिकता दी गई है।
रामायण काल में भी राम के कई अनुयायी और सहायक विभिन्न जातियों से थे; उनकी सेवा और भक्ति को महान माना गया। रामचरित्र में कर्म और नीति को अधिक महत्व दिया गया है। गीता में कहा गया है कि लोगों के गुण, प्रवृत्ति और कर्म उन्हें अलग करते हैं — जिससे प्रत्येक का वास्तविक मूल्य उसके कर्म में दिखाई देता है। यह संकेत करता है कि वर्ण कर्म-निर्देशक है, जाति नहीं। पुराणों की अनेक कहानियों में भी देखा जाता है कि देवता, राजा और सामान्य लोग के बीच संवेदनशीलता और नेतृत्व केवल वर्ण-आधारित नहीं था; यह व्यक्ति के गुण, कर्म और भक्ति का परिणाम था।
हमारी आज की जिम्मेदारी यह है कि हम समाज में समानता, शिक्षा और अवसर देकर पूर्व अन्याय को दूर कर समानता लाने के लिए कार्य करें। आधुनिक समाज में लोगों की क्षमता, शिक्षा और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करके हम एक सहिष्णु और समानताभारित समाज का निर्माण कर सकते हैं।
सनातन हिन्दू धर्म में वास्तविक अर्थों में जातिवाद के लिए स्थान नहीं है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था एक कार्य-आधारित व्यवस्था थी, जो समय, परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार निर्मित थी। आज जब काम के प्रकार, जीविका और संस्कृति अत्यधिक बदल चुके हैं, तब यह प्रथा अप्रासंगिक हो चुकी है; जातिवाद का प्रश्न ही उस पर खड़ा नहीं रह जाता। महा कुम्भ मेले जैसी घटनाएँ हमें विचार करने के लिए बाध्य करती हैं कि धर्म का मूल भक्ति, आत्मीयता और सम्मान है; इसे जाति आधारित विभाजन से विभक्त करना उचित नहीं है।

