भारतीय नागरिक कौन है?
सरकार नागरिकता के बारे में स्पष्टता दे, अस्पष्टता नहीं
अभिषेक जोशी,
मुख्य संपादक, क्रांति ओड़िशा मीडिया
मुख्य, पतीतपावन जगन्नाथ सेवा फ़ाउंडेशन एवं ओडिशा सुरक्षा सेना।
भारत में नागरिकता का मसला आज ऐसा अस्थिर मंच बन गया है जहाँ साधारण लोगों को पहचान पत्र दिए जाते हैं, पर नागरिकता का स्पष्ट सबूत नहीं दिया जाता। आधार एक पहचान दस्तावेज़ है, PAN कर-पहचान, वोटर आईडी मतदान-अधिकार, ड्राइविंग लाइसेंस चलाने का अधिकार, पासपोर्ट यात्रा दस्तावेज़ — पर इन सबको नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता ।
एक तरफ सरकार कहती है कि ये दस्तावेज़ नागरिकता के प्रमाण नहीं हैं; दूसरी तरफ वे दस्तावेज़ रोजमर्रा की जिंदगी में इतने आवश्यक हो गए हैं कि लोग स्वाभाविक ही समझने लगे हैं — “इसका मतलब यह है कि व्यक्ति नागरिक है।” यह विरोधाभास सरकार की अस्पष्टता को दर्शाता है। सरकार खुद भ्रम पैदा कर रही है। यदि किसी नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कानून की जटिल प्रक्रियाए पार करनी पड़ती हैं, तो उसमें सुविधा नहीं, उपेक्षा की बदबू आती है।
पासपोर्ट के बारे में सबसे बड़ा भ्रम यही है — पासपोर्ट मिल जाने पर मान लिया जाता है कि नागरिकता सिद्ध हो गई। हाल की चर्चाएं और सरकारी स्पष्टीकरण फिर स्पष्ट कर चुके हैं कि पासपोर्ट एक travel document है, citizenship certificate नहीं। फिर भी पासपोर्ट मिलने के लिए जांच, सत्यापन और पुलिस वेरिफिकेशन होते हैं; यह कोई आसान कागज़ नहीं है। यहां जनता का प्रश्न जायज़ है — यदि इतनी सख्त सुरक्षा जांच होती है, तो इसे नागरिकता से जोड़ने में कानून क्यों इतना अस्पष्ट रखा गया है?
भारत का कानून नागरिकता और विदेशी स्थिति में भारी फर्क करता है। Foreigners Act के तहत किसी व्यक्ति की स्थिति पर प्रश्न उठने पर नागरिकता का प्रमाण सिद्ध करने का भार उस व्यक्ति पर आ सकता है। यह न्यायोचित नहीं; यह कठोर प्रशासनिक सत्य है। राज्य को, जो अपने ही नागरिकों की पहचान नहीं कर पा रहा, उन नागरिकों पर शक का बोझ डालने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
Citizenship Act, 1955 में नागरिकता प्राप्ति के मार्ग दिये गये हैं, पर आम लोगों के लिए वे रोजमर्रा की जिंदगी में दूरस्थ, अस्पष्ट और व्यवहारिक रूप से कठिन हैं। कौन जन्म के आधार पर नागरिक है, कौन रजिस्ट्रेशन पर, कौन naturalization पर — और उनका प्रमाण क्या है — यह सरकार को सार्वजनिक भाषा में सामान्य जनता के सामने रखना चाहिए। अन्यथा भ्रम, असुरक्षा और आशंका खत्म नहीं होंगी।
यह राजनीति का सवाल नहीं है, न्याय का सवाल है। नागरिकता केवल एक प्रशासनिक तकनीक नहीं; यह मौलिक अधिकार, सम्मान और कानूनी सुरक्षा का आधार है। यदि सरकार सचमुच अपनी जनता के हित में है तो वह एक स्पष्ट citizenship record या citizenship certificate पद्धति क्यों नहीं अपनाती — इसका ठोस उत्तर देना चाहिए। नागरिकों को सेवाए देना राज्य का कर्तव्य है; नागरिकता पर शक रखना राज्य की नीति नहीं हो सकती।
आज के भारत को अधिक दस्तावेजों की नहीं, बल्कि अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है। हम नागरिक हैं या नहीं — यह प्रश्न उलझन का विषय नहीं होना चाहिए। यदि सरकार अपनी नागरिकता संबंधी जिम्मेदारी निभाने में विफल है, तो दस्तावेज़ होने के बावजूद भी आत्मविश्वास खो जाएगा। अब चाहिए — कठोर नहीं, स्पष्ट और व्यवहारिक एक नीति।

