प्रस्तावना : भारतीय संस्कृति में ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ मानव जाति को हिंदू धर्म द्वारा दिया गया एक अनूठा उपहार है! जब भी राष्ट्र और धर्म संकट में पड़े, तब धर्म की स्थापना का कार्य इसी ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा ने किया है। गुरुपूर्णिमा के अवसर पर इस महान गुरु-शिष्य परंपरा का स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही, राष्ट्र और धर्म के कार्यों में सफलता पाने के लिए गुरु-कृपा और साधना की आवश्यकता होती है, इसके बारे में हम इस लेख में जानेंगे।
*गुरु-शिष्य परंपरा :* एक बार एक विदेशी व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद जी से प्रश्न पूछा, “अगर भारत का वर्णन एक वाक्य में करना हो, तो आप कैसे करेंगे?” तब स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, “गुरु-शिष्य परंपरा!” ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ हिंदुओं की लाखों वर्षों की चैतन्यमयी संस्कृति है; परंतु समय के साथ रज-तम प्रधान संस्कृति के प्रभाव के कारण इस महान गुरु-शिष्य परंपरा की उपेक्षा हो रही है। गुरु और शिष्य के इस सुंदर संगम से महान राष्ट्र के निर्माण के कई उदाहरण पुराणों से लेकर इतिहास तक देखने को मिलते हैं, जैसे- श्री राम और महर्षि वसिष्ठ, पांडव और श्रीकृष्ण। चंद्रगुप्त मौर्य को आर्य चाणक्य ने गुरु के रूप में मार्गदर्शन दिया और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण किया। छत्रपति शिवाजी महाराज को समर्थ रामदास स्वामी और संत तुकाराम महाराज ने मार्गदर्शन दिया, जिसके बल पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने पांच पातशाहियों (सल्तनतों) को पराजित कर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। ये हमारे आदर्श हैं।
‘गुरु-शिष्य परंपरा’ भारत की विशेषता है। अनेक विदेशी आक्रमणों के बाद भी हिंदू धर्म जो पूरी मजबूती के साथ टिका रहा, वह इसी ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ के कारण है। आज इस गुरु-शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है। इसके लिए भारत का पुनः हिंदू राष्ट्र बनना आवश्यक है।
*गुरुपूर्णिमा और गुरुपूजन :* गुरुपूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु के चरणों की पूजा (पाद्यपूजा) कर श्रद्धापूर्वक गुरुदक्षिणा अर्पित करते हैं। इस दिन महर्षि व्यास की पूजा करने की परंपरा है। कुंभकोणम और शृंगेरी में व्यासपूजा का विशेष उत्सव मनाया जाता है। संन्यासी इस दिन शंकराचार्य जी को व्यास स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। गुरुपूजन के लिए स्नान के बाद संकल्प करके व्यासपीठ तैयार किया जाता है और ब्रह्मा, परात्परशक्ति, व्यास, शुकदेव, गौड़पाद, गोविंदस्वामी व शंकराचार्य इनकी षोडशोपचार (सोलह सामग्रियों से) पूजा की जाती है। इसके साथ ही दीक्षागुरु और माता-पिता का पूजन करने की भी प्रथा है।
*संगठन की अदृश्य शक्ति साधना और गुरु-कृपा :*
“सामर्थ्य आहे चळवळीचे ।
जो जो करील तयाचे ।
परंतु येथें भगवंताचें ।
अधिष्ठान पाहिजे ॥” – दासबोध, दशक 20, समास 4, ओवी 26
भावार्थ : समर्थ रामदास स्वामी ने कहा है कि साधना से ईश्वरीय अधिष्ठान (कृपा/आशीर्वाद) प्राप्त होता है, जिससे राष्ट्र और धर्म का कार्य बहुत अच्छे तरीके से संपन्न हो सकता है।
यदि ‘साधना और धर्म’ संगठन की नींव हो, तो राष्ट्र व धर्म के कार्य रूपी इमारत का आधार साधना के कारण अत्यंत सुदृढ़ हो जाता है। साधना से ही किसी भी परिस्थिति में स्थिर रहने और सही निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त होती है। कलियुग में नामस्मरण (भगवान का नाम लेना) ही सर्वश्रेष्ठ साधना है। भगवान का नाम ही हमें पार लगाने वाला है। इसीलिए जिन्होंने नाम-साधना शुरू नहीं की है, वे आज से ही अपनी कुलदेवी या कुलदेवता के नामजप से साधना की शुरुआत करें। उदाहरण के लिए, यदि कुलदेवी श्री महालक्ष्मी हैं, तो ‘श्री महालक्ष्मीदेव्यै नम:।’ ऐसा नामजप करें; यदि कुलदेवी श्री रेणुकामाता हैं, तो ‘श्री रेणुकादेव्यै नमः।’ ऐसा नामजप करें; और यदि कुलदेवी के बारे में ज्ञात न हो, तो ‘श्री कुलदेवतायै नम:।’ ऐसा नामजप करें। जिन्हें गुरुमंत्र मिला हुआ है, वे गुरुमंत्र का अधिक से अधिक जप करें। साधना और गुरु-कृपा ही संगठन की अदृश्य शक्ति है।
धर्म और राष्ट्र एक ही सिक्के के दो पहलू ! : सनातन धर्म और राष्ट्र एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि हिंदू धर्म नहीं रहेगा, तो राष्ट्र नहीं टिकेगा और यदि राष्ट्र नहीं रहेगा, तो धर्म का पालन नहीं किया जा सकेगा।
आज संपूर्ण विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है। इसके साथ ही कई प्राकृतिक आपदाएं मुंह बाए खड़ी हैं। कहीं युद्ध है तो कहीं आंतरिक अराजकता और अस्थिरता, कहीं अतिवृष्टि (भारी बारिश) है तो कहीं अनावृष्टि (सूखा), वहीं यूरोप जैसे देश भीषण लू (उष्णता की लहर) की चपेट में झुलस रहे हैं। ऊपरी तौर पर देखने में यह सब सामान्य लग सकता है, परंतु हमारे धर्मग्रंथों में इसके कारण बताए गए हैं। धर्मग्रंथों में वर्णित ‘सप्त ईति’ (सात प्रकार के संकटों) के अनुसार:
‘अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषकाः शुकाः । स्वचक्रं परचक्रं च सप्तैता ईतयः स्मृताः ॥’
अर्थ : अतिवृष्टि (अत्यधिक वर्षा), अनावृष्टि (सूखा), टिड्डियों का हमला, चूहों का उपद्रव, पक्षियों के कारण फसलों को होने वाली हानि, आंतरिक कलह/गृहयुद्ध और विदेशी आक्रमण — इन सात प्रकार की आपदाओं को ‘सप्त ईति’ कहा गया है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि जब समाज में धर्म, नीति और सुशासन का ह्रास (पतन) होता है, तब प्रकृति, कृषि, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रव्यवस्था पर विभिन्न प्रकार के संकट मंडराने लगते हैं। इस प्रकार, धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं।
महाभारत के समय केवल कौरवों-पांडवों और उनकी सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था। आज कलियुग में इस धर्मयुद्ध का प्रभाव हर किसी पर है। कोई भी इसमें तटस्थ (न्यूट्रल) नहीं रह सकता। तब भी और अब भी केवल दो ही विकल्प थे – धर्म और अधर्म! ऐसे समय में धर्म के पक्ष में रहकर स्वयं को समर्पित करना ही आज के समय की साधना है और यही आध्यात्मिक उन्नति या मुक्ति का मार्ग भी है। जब महाभारत के समय अर्जुन भ्रम की स्थिति में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उपदेश दिया था कि, ‘अधर्म के विरुद्ध लड़ना ही धर्म है।’ आज गुरुतत्व को भी यही अपेक्षित है कि, ‘साधना करके स्वयं में ब्राह्मतेज बढ़ाना और अधर्म के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने भीतर क्षात्रतेज को जागृत करना।’
‘हम राष्ट्र-धर्म के कार्य में स्वयं को समर्पित करें। पूरी क्षमता के साथ राष्ट्र-धर्म की रक्षा का कार्य करें।’ ऐसा करना ही सच्ची गुरुदक्षिणा होगी। ‘इसके लिए श्री गुरु हमें शक्ति प्रदान करें’, श्रीकृष्ण के चरणों में यही प्रार्थना है!

