ओडिशा में जनसंघ से भाजपा 2026 तक
ओडिशा में विपक्ष 2026 से आगे की ओर
नन्द किशोर जोशी
एक्जिक्यूटिव एडिटर
क्रांति ओडिशा मीडिया
भारत में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई है 1951- 1952 में।डोक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके संस्थापक अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात पंडित दीनदयाल उपाध्याय इसके अध्यक्ष रहे। भारतीय जनसंघ चुनावी राजनीति में सक्रिय रही 1977 तक। तत्पश्चात 1977 में ही इसका विलय होगया था जनता पार्टी में।उस समय वाजपेई, आडवाणी केंद्र सरकार में मंत्री थे।
अब मैं ओडिशा परिप्रेक्ष्य में भारतीय जनसंघ के बारे में बताना चाहता हूं।1972 नवंबर में कटक में विधानसभा का उपचुनाव हुआ था। उपरोक्त उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी कांग्रेस की तरफ से उम्मीदवार थी। भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी।
विपक्षी उम्मीदवार थे कटक में पूर्व मुख्यमंत्री बिरेन मित्र।बिरेन मित्र को पूर्व मुख्यमंत्री बिजु पटनायक, पूर्व मुख्यमंत्री डोक्टर हरे कृष्ण महताब का सहयोग, समर्थन पूरा मिल रहा था।
उस उपचुनाव में करोड़ों रुपए खर्च हुए थे। पूरे भारत में किसी भी उपचुनाव में संभवतया यह सबसे बड़ा चुनावी खर्चिला कैंपेन था 1972 तक। कांग्रेस की ओर से उस समय करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे ,उससे थोड़ा कम विपक्षियों द्वारा खर्च किए गये थे।
उपचुनाव में कांग्रेसी मुख्यमंत्री नंदिनी सत्पथी की जीत हुई। पूर्व मुख्यमंत्री बिरेन मित्र हारे। खास बात यह है कि उपरोक्त उपचुनाव में उस समय की भारतीय जनसंघ का कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं था।जनसंघ की तरफ से कटक विधानसभा उपचुनाव में कोई समर्थन या विरोध किसी के पक्ष या विपक्ष में भी नहीं था। दरअसल भारतीय जनसंघ का कोई वजूद या अस्तित्व 1972 तक ओडिशा राजनीति में नहीं था।
1973 मार्च में कटक मुनिसिपालटि काउंसिल का चुनाव हुआ। भारतीय जनसंघ ने मुनिसिपाल चुनाव में कुछ वार्डों में,कुछ उम्मीदवारों को उतारा। उनमें 9 नंबर वार्ड के उम्मीदवार बांका बजार निवासी शारदा प्रसाद महांति जनसंघ की तरफ से खड़े हुए थे।
उनका चुनाव चिन्ह था लालटेन। चूंकि जनसंघ का चुनाव चिन्ह था दीपक,उससे मिलता जुलता चुनाव चिन्ह लालटेन उनको दिया गया। चूंकि उस समय ओडिशा में मुनिसिपाल , पंचायत चुनावों में कोई पार्टी का चिन्ह नहीं दिया जाता था। अतः लालटेन चिन्ह पर खड़े हुए और हारे। मतलब 1973 के पहले कटक में उस समय के जनसंघ और आजकी भाजपा का चुनाव में कोई नामोनिशान नहीं था।
1977 में अखिल भारतीय स्तर पर भारतीय जनसंघ जनता पार्टी में विलय कर ली। जनसंघ खत्म हुई।आपसी मतभेद के कारण वाजपेई, आडवाणी जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना किए अप्रैल 1980 में। चुनाव चिन्ह रहा कमल।
1980 से लेकर 1994 तक भाजपा को ओडिशा में कोई चुनावी सफलता नहीं मिली।1995 में समीर दे कटक विधायक बने। ओडिशा में दूसरी जगहों से दो और विधायक बने। ओडिशा विधानसभा में भाजपा का खाता खुला 3 विधायकों के साथ।
1998 लोकसभा चुनाव में बीजेपी -बीजेडी में समझौता हुआ और बीजेडी के नवीन पटनायक वाजपेई केबिनेट में इस्पात, खनिज मंत्री बने।2000 में ओडिशा विधानसभा चुनाव बीजेपी -बीजेडी साथ साथ लडे , शासन में आये।
नवीन पटनायक मुख्यमंत्री बने और भाजपा छोटे भाई की भूमिका में रहकर कुछ मंत्री पद पायी।2009 तक यानि 2 टर्म तक बीजेपी -बीजेडी ओडिशा में सत्ता सुख भोगते रहे साथ-साथ।
2009 से भाजपा का रास्ता बीजेडी से अलग हुआ। विधानसभा चुनाव में भाजपा के सदस्यों की संख्या काफी घटी। बीजेडी का साथ नहीं मिला।2009 से लेकर 2024 तक भाजपा अलग लडी और सत्ता में आ गयी 2024 में, मोहन माझी मुख्यमंत्री बने भाजपा के।
बीजेडी अपने स्थापना काल से यानि 1998 से 2023 तक लगातार लोकसभा, विधानसभा, पंचायत,मुनिसिपाल चुनाव जीतती रही और अंत में हारी 2024 साधारण चुनाव में।
अब 2024 विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आने पश्चात ओडिशा में पुरानी चुनावी गणित कुछ गड़बड़ा गई है। बीजेडी में छोटे से लेकर बड़े नेताओं में बीजेडी छोड़ने की होड़ लगी है।
राज्यसभा सांसद बीजेडी छोड़कर भाजपा में आते हैं,सांसदी से इस्तीफा देते हैं, भाजपा में शामिल होते हैं, राज्यसभा उपचुनाव में भाजपा की तरफ से खड़े होते हैं, कुछ दिनों के अंतराल पश्चात पुनः राज्यसभा पहुंच जाते हैं।अब ओडिशा कोटे से धीरे-धीरे भाजपा के राज्यसभा सांसदों की संख्या बढ़ रही है।इसका सीधा लाभ भाजपा को हो रहा है और नुकसान बीजेडी को हो रहा है।
उपरोक्त प्रक्रिया के कारण नवीन भाजपा से ख़फ़ा हैं। नवीन 2014 से लेकर अभी कुछ दिनों पहले तक लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मोदी सरकार का समर्थन कर रहे थे, लेकिन अब केंद्र और राज्य दोनों में विरोध की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
आजकल पूरी ओडिशा में छोटे बड़े अनेक बीजेडी नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। बीजेडी धीरे धीरे कमजोर होती जारही है। कांग्रेस यहां पिछले 17 सालों से मुख्य विपक्षी भूमिका में भी नहीं है। विधानसभा में लगातार कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटती जारही है।
ओडिशा में हाल फिलहाल एक नयी राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ है।नाम है इसका ओडिशा जनता कांग्रेस। इसके सभापति हैं कटक के पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम। आजकल इनकी बेटी कटक बाराबाटि की विधायिका हैं।
मोहम्मद मोकिम की संभवतया सोच यह है कि आगामी 2029 के साधारण चुनाव में भाजपा, कांग्रेस,बीजेडी दलों से जिन आशायी उम्मीदवारों को उनकी पार्टी टिकट नहीं देगी ,उनको मोकिम की पार्टी ओडिशा जनता कांग्रेस टिकट देकर चुनाव लडायेगी । अपने को ओडिशा राजनीति में स्थापित करने की कोशिश करेगी।
जैसा अभी से प्रतीत होता है कि आगामी 2027 में ओडिशा में पंचायत, म्युनिसिपल चुनाव होने हैं। कांग्रेस,बीजेडी , ओडिशा जनता कांग्रेस जोर आजमाइश करेंगी , लेकिन सफलता इनसे कोसों दूर रहेगी।
इसतरह 2029 में लेकिन ओडिशा विधानसभा, लोकसभा चुनावों में बीजेडी, कांग्रेस, वामपंथी साथ में लड़ेंगे, लेकिन मजबूत भाजपा के सामने टिकना मुश्किल है और भाजपा को चुनावी सफलता एक बार फिर मिलने की उम्मीद है। ओडिशा जनता कांग्रेस बीजेडी, कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को लेकर चुनाव लड़ेगी , लेकिन चुनावी कामयाबी कुछ मिलने वाली नहीं दिखाई देरही है। लेकिन पैसे के जोर पर यह नयी पार्टी आने वाले कुछ सालों तक मीडिया की सुर्खियां बटोरेगी ।


