भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल जेल (Lahore Central Jail) में फांसी दी गई थी। फांसी की तारीख 23 मार्च 1931 और समय: शाम 7:30 बजे की बजाय निर्धारित समय से 11 घंटे पहले सुबह करीब 7:30 बजे (कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार शाम को तय थी, जिसे बदलकर सुबह कर दिया गया था) उनके साथ शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को भी इसी जेल में फांसी दी गई थी।
इस ऐतिहासिक जेल को 1961 में पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था। लाहौर सेंट्रल जेल (Lahore Central Jail) की जगह पर वर्तमान में शादमान कॉलोनी (Shadman Colony) बसाई गई है। इसी जेल के फांसी वाले स्थान पर अब ‘शादमान चौक’ (जिसे भगत सिंह चौक भी कहा जाता है) स्थित है, जहाँ 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी।
नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी नामक एक नेता की 1974 में 10-11 नवंबर 1974 की आधी रात (लगभग 12:30 बजे हत्या पाकिस्तान के लाहौर में शादमान कॉलोनी (शादमान चौक) के पास हो जाती है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी की 1974 में हुई हत्या की साजिश रचने और हत्या का आदेश देने के अपराध में फांसी की सजा दी गई थी। वर्ष 1974 में कार पर हुए हमले में उनके पिता नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी की गोली लगने से मौत हो गई थी। इस मामले में उनके बेटे अहमद रज़ा क़सूरी ने भुट्टो पर हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। लेकिन प्रधान मंत्री के ऊपर किसी की हिम्मत नहीं थी कि उन पर कोई मुक़दमा दर्ज कर सके।
इसके बाद प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने ने अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए जिया उल हक़ को 1 मार्च 1976 में पाकिस्तान का सेना अध्यक्ष (Chief of Army Staff) बना दिया। जुल्फिकार अली भुट्टो ने कई वरिष्ठ जनरलों को नजरअंदाज करके जूनियर जनरल रहे जिया उल हक को सेना प्रमुख नियुक्त किया था। लेकिन, सत्ता संघर्ष में, ज़िला उल हक़ ने बाज़ी मार ली। सेना प्रमुख बनने के ठीक एक साल बाद, 5 जुलाई 1977 को जिया उल हक ने तख्तापलट कर भुट्टो की सरकार को हटा दिया था। फिर शुरू हुआ असली खेल, भुट्टो पर मोहम्मद अहमद खान कसूरी की 1974 में हुई हत्या की बंद फाइल पर जेल में डाल दिया गया।
लाहौर उच्च न्यायालय ने 18 मार्च 1978 को उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद 4 अप्रैल 1979 को रावलपिंडी की जेल में उन्हें फांसी दी गई थी।
बाद में मार्च 2024 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से यह स्वीकार किया कि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के नियमों का पालन नहीं किया गया था।
जिस नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी की हत्या के आरोप में भुट्टो को फाँसी हुई, उस का भगत सिंह के साथ एक इतिहास जुड़ा है।
जिस की हत्या लाहौर के ‘शादमान चौक’ भगत सिंह चौक पर हुई, वह व्यक्ति था उस समय मानद मजिस्ट्रेट (Honorary Magistrate) नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी। इसी ब्रिटिश के वफ़ादार नौकर मोहम्मद अहमद खान कसूरी ने ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी के डेथ वारंट पर हस्ताक्षर किए थे। और ऐसा कहा जाता है कि उस समय भारतीय जनभावनाओं और विरोध के चलते कोई भी अन्य मजिस्ट्रेट इस फांसी की प्रक्रिया की देखरेख या गवाही देने को तैयार नहीं था, जिसके बाद नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी ने मानद मजिस्ट्रेट के तौर पर इस पर हस्ताक्षर किए और फांसी के वक्त वहां मौजूद रहे।
भारत के उन वीर बलिदानियों की आत्मा का ही शाप रहा जिससे उस नवाब की मृत्यु वही लाहौर सेंट्रल जेल के स्थान पर बने ‘शादमान चौक’ (भगत सिंह चौक) पर हुई।

