श्री गणेश को पारंपरिक रूप से दूर्वा ही अर्पित की जाती है । क्या यह केवल कई वर्षों से चली आ रही एक परंपरा है, या इसके पीछे कोई आध्यात्मिक शास्त्रीय कारण भी है? अध्यात्मशास्त्र के अनुसार, विशिष्ट देवता को विशिष्ट फूल, पत्री और दूर्वा अर्पित की जाती हैं; क्योंकि उनमें उस विशिष्ट देवता के तत्त्व को आकर्षित और प्रक्षेपित करने की क्षमता अधिक होती है।
गोवा स्थित ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के शोधकर्ताओं ने ‘पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरेंस फोटोग्राफी’ (PIP) तकनीक का उपयोग करके इस पारंपरिक पद्धति का अध्ययन किया। यह एक विशेष वीडियो-इमेजिंग तकनीक है, जो वस्तु या व्यक्ति के आसपास के अदृश्य प्रभामंडल (Aura) को कैप्चर करके उसे दृश्य रंगों में परिवर्तित करती है। इस प्रयोग में श्री गणेश के चित्र के सामने तुलसी और दूर्वा रखने के बाद होने वाले परिणामों की तुलना की गई।

कोई भी वस्तु रखने से पहले श्री गणेश के चित्र के आसपास के वातावरण का ‘PIP’ द्वारा मूलभूत (Baseline) रीडिंग लिया गया। इसके बाद श्री गणेश के चित्र के सामने तुलसी रखकर दूसरी रीडिंग ली गई। इसके बाद दूर्वा रखकर पुनः रीडिंग ली गई। इसके परिणाम चित्र में दर्शाए गए हैं।
पीढ़ियों से हिंदू भक्त विशिष्ट देवताओं को विशिष्ट फूल, पत्री और दूर्वा अर्पित करते आए हैं। इस प्रयोग में श्री गणेश के चित्र के सामने तुलसी और दूर्वा रखने के परिणामों में उल्लेखनीय अंतर दिखाई दिया। श्री गणेश के चित्र के सामने तुलसी रखने पर मूलभूत रीडिंग की तुलना में सकारात्मक ऊर्जा में थोड़ी कमी हुई, जबकि दूर्वा रखने पर सकारात्मक ऊर्जा की रीडिंग में बड़ी मात्रा में वृद्धि दिखाई दी। इस प्रकार के निरीक्षण हमें अपनी पारंपरिक आध्यात्मिक पद्धतियों और उनके पीछे के सिद्धांतों को अधिक सूक्ष्मता से देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
शोधकर्ता समूह के मतानुसार, ये निरीक्षण अध्यात्मशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत की पुष्टि करते हैं – वनस्पतियों में मौजूद विशिष्ट घटक किसी विशिष्ट देवता के स्पंदनों को आकर्षित और प्रक्षेपित करने में सक्षम होते हैं। इसके अनुसार, दूर्वा एक प्राकृतिक ‘एंटीना’ की तरह कार्य करती है; जो श्री गणेश तत्त्व को आकर्षित करके उसे आसपास के वातावरण में प्रक्षेपित करने के लिए विशेष रूप से पूरक होती है।
इसलिए सभी साधकों और जिज्ञासुओं, जब आप श्री गणेश को भावपूर्ण रूप से दूर्वा अर्पित करें, तब यह ध्यान रखें कि आप गणेश तत्त्व को अधिक से अधिक मात्रा में ग्रहण करने के लिए अत्यंत अनुकूल वातावरण का निर्माण कर रहे हैं!
शोधकर्ताओं के अनुसार, ‘हिंदू धर्म की पारंपरिक पद्धतियों के पीछे व्यावहारिक और गहन विज्ञान है। इसके पीछे की सूक्ष्म कार्यप्रणाली को समझने पर हम अपनी दैनिक पूजाविधियों के माध्यम से अधिक से अधिक सकारात्मक स्पंदन प्राप्त कर सकते हैं।’

