मासखमण प्रत्याख्यान समारोह
कटक, मानव जीवन का उद्देश्य है- मुक्ति । तपस्या उसका साधन है। तपस्या की परिणति आत्मानन्द है। प्रत्येक धर्म और परम्परा में तप के अनेक प्रकार के अनुष्ठान होते है। जैन परम्परा में तप के बारह प्रकारों का वर्णन है। जैन परम्परा में साधु-साध्वियां ही नहीं श्रावक-श्राविकाएं भी तप से जुड़े हुए हैं। इसमें भी चतुर्मास काल में तप का क्रम बहुलता के साथ होता है।जैन शासन में अतीत में बड़े-बड़े महान तपस्वीजनों ने तप में निरत रहकर जैन धर्म की प्रभावना को शिखरों चढाया है। इसी कड़ी में श्रीमती स्नेहलता चिंडालिया ने कटक में मुनि मोहजीत कुमारजी के सान्निध्य में 27 दिन की तपस्या कर इतिहास बनाया।
उनके तप अनुमोदना के कार्यक्रम में अनुमोदन गीत की प्रस्तुति के साथ मुनि मोहजीत कुमार जी ने कहा- तप आत्मशुद्धि एवं संघ की वृद्धि का महान आधार है। मोक्ष मार्ग में गतिमान होने के चार रास्ते में एक पथ है-तप । तपस्वी का साध्य है- कर्मो का निर्जरण करना । तपस्या शरीर, मन और भाव शुद्धि का माध्यम है।
मुनि ने आगे कहा-सभी धर्मो में तप को बहुत महत्व दिया गया है। तप के अनेक प्रकार है। सभी तप त्याग और संयम की अवधारणा से जुड़े हुए है। इन तपो की श्रृंखला में जैन धर्म में तप की अपनी विशिष्टता है। जिसमें निराहार और निर्जल तब का योग रहता है। 
मुनि भव्यकुमार जी ने संयोजकीय वक्तव्य में तप की महत्ता को प्रकट करते हुए कहा तप उच्च मनोबल और आत्म साधना का प्रथम सौपान है। इसी के माध्यम से मोक्ष गति की ओर प्रस्थान किया जा सकता है।
तप के प्रभाव की व्याख्या करते हुए
मुनि जयेश कुमार जी ने कहा ऐसी बड़ी तपस्याऐं रोलरकॉस्टर की तरह होती है।अनेक उतार चढ़ाव आते है।रोज़ नए अनुभव होते है।व्यक्ति जब खाता है तब उसे सिर्फ बाहरी शक्ति का बोध होता है पर निराहार अवस्था मे उसे अपनी अंतः शक्ति का अहसास होता है।अपनी आत्म शक्ति को साधने का सशक्त माध्यम तपस्या है।
तप प्रत्याख्यान समारोह में तेरापंथ महिला मण्डल, कटक व पारिवारिक जनों ने गीत के माध्यम से तपस्वी बहन के तप के प्रति मंगलकामना की। तेरापंथी सभा अध्यक्ष मुकेश सेठिया, संरक्षक मोहनलाल जी सिंघी ,खुश चिण्डालिया, याशिका चिण्डालिया, जिनय चिण्डालिया, रोशन चिण्डालिया सहित विशाल जनमेदिनी ने तप के प्रति अपनी अनुमोदना प्रकट की।

