दावोस, स्विट्जरलैंड: दावोस के ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ 2026 में गोवा द्वारा ‘दिव्य कणों’ पर दी गई प्रस्तुति मुख्य आकर्षण का केंद्र रही। ‘स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन’ (SSRF) और ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ (MAV) के शोधकर्ता शॉन क्लार्क और श्वेता क्लार्क ने इन कणों को भौतिक विज्ञान से परे एक अद्वितीय खोज के रूप में वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया।
पृष्ठभूमि: मार्च 2012 में सर्वप्रथम सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले जी के हाथों पर दिखे ये सुनहरे कण, अब 20 से अधिक देशों में साधकों की त्वचा, वस्त्रों, यहाँ तक कि लेमिनेटेड सतहों के नीचे भी विभिन्न रंगों में पाए गए हैं।
सत्र का मुख्य आकर्षण: सत्र के समय एक प्रतिभागी के चेहरे पर ‘दिव्य कण’ दिखने से चर्चा अत्यंत रोमांचक हो गई और यह सैद्धांतिक प्रस्तुति देखते ही देखते एक जीवंत अनुभव बन गई।
वैज्ञानिक विश्लेषण: शोध दल ने ‘भाभा परमाणु शोध केंद्र’ (BARC) तथा ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान’ (IIT), मुंबई की वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में हुए भौतिक और रासायनिक परीक्षणों के निष्कर्ष भी साझा किए।
प्रमुख निष्कर्ष :
• ये मुख्य रूप से कार्बन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से बने हैं पर जैविक या धातु पदार्थों से भिन्न हैं।
• ये सांद्र नाइट्रिक एसिड या एक्वा रेजिया (अम्लराज) के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाते।
• अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने के बाद भी ये अपनी चमक बनाए रखते हैं।
इस शोध से जुड़े BARC के एक पूर्व वैज्ञानिक ने बताया कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ऊर्जा का पदार्थ में रूपांतरण (E = mc²) ‘आधुनिक भौतिकी’ में पहले से स्थापित है। ऊर्जा वास्तुकार ‘मयंक बड़जात्या’ के परीक्षण में ‘लेकर एंटीना’ ने इन कणों के प्रति कोई कंपन (vibrations) नहीं दर्शाया, जबकि यह उपकरण प्राकृतिक पदार्थों पर प्रतिक्रिया देता है।
*निष्कर्ष*: सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बालाजी आठवले की कृपा से प्रकट होने वाले ये कण ‘ईश्वरीय चैतन्य’ के घनीभूत रूप हैं, जो इस संधिकाल में साधकों की सुरक्षा तथा उनकी आध्यात्मिक प्रगति में सहायक हैं।
जो गोवा में 2012 में शुरू हुआ था, उसने अब दावोस में वैश्विक जिज्ञासा जगा दी है – और शोधकर्ताओं का कहना है कि यह घटना गहन अंतःविषय शोध के योग्य है।

