प्रति वर्ष श्राद्धविधि करना हिंदू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण आचार है और इसका महत्त्व अनन्यसाधारण है। पुराणकाल से चली आ रही इस विधि का महत्त्व हमारे ऋषि-मुनियों ने अनेक धर्मग्रंथों में वर्णित किया है। इस लेख में हम ‘सर्वपितृ अमावस्या का महत्त्व’ जानेंगे। दिनांक के अनुसार, इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है।
*सर्वपितृ अमावस्या क्या है?:*
पितृपक्ष की अमावस्या को ‘सर्वपितृ अमावस्या’ कहते हैं। इस तिथि पर कुल के सभी पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है।
पूरे वर्ष अथवा पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना संभव न होने पर, इस तिथि को सभी पितरों के लिए श्राद्ध करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है; क्योंकि यह पितृपक्ष की अंतिम तिथि है। शास्त्रों में श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि को विशेष योग बताया गया है तथा पितृपक्ष की अमावस्या को सर्वाधिक योग्य तिथि माना गया है।

*महालय श्राद्ध का उचित समय:*
शास्त्रों में जिन कृतियों के लिए जो काल निश्चित किया गया है, उस काल में वह कृति करना आवश्यक और महत्त्वपूर्ण बताया गया है। इसलिए पितृपक्ष में ही महालय श्राद्ध करना चाहिए। विभिन्न धर्मग्रंथों में पितृपक्ष में महालय श्राद्ध करने का उल्लेख मिलता है।
पितृपक्ष में सामान्यतः मृत व्यक्ति की मृत्यु-तिथि के अनुसार एक दिन महालय श्राद्ध किया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति जन्माशौच या मृत्युआशौच (सूतक) अथवा किसी अन्य अपरिहार्य कारण से उस तिथि पर महालय श्राद्ध करने में असमर्थ हो, तो उसे सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सुविधानुसार कृष्ण पक्ष की अष्टमी, द्वादशी, अमावस्या अथवा व्यतीपात योग के दिन भी महालय श्राद्ध किया जा सकता है।
*श्राद्ध और नामजप का संबंध*
कलियुग में कम-अधिक प्रमाण में प्रत्येक व्यक्ति को आध्यात्मिक कष्ट होने के कारण श्राद्ध करने के साथ ‘श्री गुरुदेव दत्त’ नामजप भी अधिकाधिक करना चाहिए।
दत्त देवता को पितरों का स्वामी माना गया है। अतः उनके नामजप से पितरों को सद्गति प्राप्त होने में सहायता होती है और उसका लाभ साधक को भी होता है।

