राष्ट्ररक्षा के लिए धर्माचरण एवं साधना आवश्यक – हिन्दू जनजागृति समिति

*प्रस्तावना :* भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, धर्म तथा राष्ट्रजीवन का मार्गदर्शक माना गया है। गुरु पूर्णिमा केवल गुरु-पूजन का पर्व नहीं, बल्कि उनकी शिक्षाओं के अनुसार धर्माचरण, साधना तथा आदर्श जीवन जीने का संकल्प लेने का पावन अवसर है।

 

आज संपूर्ण विश्व युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई तथा सामाजिक संघर्ष जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। रूस–यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष तथा इनके कारण बढ़ी पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें, महंगाई और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं का प्रभाव भारत सहित पूरे विश्व पर पड़ा है। ऐसी परिस्थितियों में केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि राष्ट्रभक्ति, सुदृढ़ चरित्र तथा धर्माधारित जीवन-मूल्य भी उतने ही आवश्यक हैं। गुरुकृपा से प्रेरित धर्माचरण और साधना व्यक्ति में राष्ट्रनिष्ठा, नैतिकता तथा समाजहित की भावना को विकसित करते हैं। आइए, इस लेख के माध्यम से इन मार्गदर्शक सिद्धांतों को समझने का प्रयास करें।

 

*जागरूक नागरिक आवश्यक :* राष्ट्ररक्षा केवल सेना, पुलिस अथवा शासन की ही जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक का भी यह कर्तव्य है कि वह अपने कार्यक्षेत्र में होने वाले अन्याय, भ्रष्टाचार तथा अनैतिक कृत्यों के विरुद्ध वैधानिक और शांतिपूर्ण माध्यमों से आवाज उठाए।

*संस्कारित पीढ़ी के निर्माण की आवश्यकता :* आज बच्चों को मुख्यतः भौतिक सफलता प्राप्त करने के लिए शिक्षा दी जाती है, किंतु चरित्र, धर्म, संस्कार और साधना के महत्त्व पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप स्वार्थ, हिंसा, नशे की प्रवृत्ति तथा पारिवारिक विघटन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। यदि राष्ट्र को सुदृढ़ बनाना है, तो आने वाली पीढ़ी को सात्त्विक मूल्यों, धर्माचरण और संस्कारों की शिक्षा देना आवश्यक है। धर्माचरण करने वाली पीढ़ी का निर्माण आज की आवश्यकता है।

 

*राष्ट्राभिमान और धर्माभिमान का महत्त्व :* विश्व के अनेक देशों और समाजों में लोग धर्म के आधार पर संगठित होते हैं, किंतु हिंदू समाज अनेक बार जाति, भाषा अथवा प्रांत जैसे संकीर्ण भेदों में विभाजित दिखाई देता है। साधना, धर्माचरण और धर्माभिमान से समाज में एकात्मता की भावना विकसित होती है। आध्यात्मिक साधना व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाती है। ऐसे जागरूक और संगठित व्यक्तियों के माध्यम से राष्ट्र और धर्म पर होने वाले आघातों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है। इसलिए प्रत्येक बालक और बालिका में बचपन से ही राष्ट्राभिमान और धर्माभिमान के संस्कार विकसित करना समय की आवश्यकता है।

*राष्ट्ररक्षा के कार्य में योगदान :* इस गुरु पूर्णिमा पर आइए, हम सभी यह दृढ़ संकल्प करें—

 

*”मैं अपनी आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ राष्ट्र की प्रगति के लिए भी निरंतर प्रयास करूंगा। स्वरक्षा के साथ राष्ट्ररक्षा के लिए सदैव तत्पर रहूंगा तथा धर्माचरण, साधना और सदाचार को अपने जीवन में अपनाकर अन्य लोगों को भी राष्ट्र और धर्म की सेवा के लिए प्रेरित करूंगा। गुरुकृपा के बल पर आदर्श नागरिक बनकर राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपना योगदान समर्पित करूंगा।”

 

 

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