रक्षा मंत्री ने हैदराबाद स्थित डीआरडीएल में अत्याधुनिक हथियार प्रणाली परिसर का उद्घाटन किया

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 12 जून, 2026 को तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीआरडीएल) – डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल कॉम्प्लेक्स में एक अत्याधुनिक हथियार प्रणाली परिसर का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने अपने संबोधन में भारत की तकनीकी उत्कृष्टता, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा में डीआरडीओ के मिसाइल सिस्टम तथा स्ट्रैटेजिक सिस्टम क्लस्टर के अहम योगदान की सराहना की। रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों का असाधारण प्रदर्शन भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास तंत्र की बढ़ती क्षमता का प्रमाण है।

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श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि डीआरडीओ द्वारा विकसित आकाश और ब्रह्मोस जैसी प्रणालियों ने यह साबित कर दिया है कि भारत में वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में प्रतिस्पर्धा करने की पूरी क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि शांति के लिए ताकत सबसे जरूरी है और आत्मनिर्भरता ही उस शक्ति का सबसे भरोसेमंद आधार है। डीआरडीओ ने अपने कार्यों के माध्यम से इस सत्य को प्रमाणित किया है।

रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वायु रक्षा प्रणालियों की अहम भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सीमाओं पर हवाई खतरों का साया मंडरा रहा था, तब हमारी वायु रक्षा प्रणालियों ने दुश्मन के इरादों को पूरी तरह नाकाम कर दिया। उन्होंने कहा कि मध्य-पूर्व के संघर्ष वाले इलाकों में वायु रक्षा प्रणालियों की अहम भूमिका देखी जा सकती है। इसके साथ ही, श्री सिंह ने ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के जरिए अत्याधुनिक बहु-स्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली बनाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने कहा, “प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ की घोषणा की थी। यह नए भारत के लिए एक अत्याधुनिक बहु-स्तरीय मिसाइल रक्षा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह प्रणाली न केवल सैन्य ठिकानों एवं महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी, बल्कि नागरिक अवसंरचना और अन्य रणनीतिक प्रतिष्ठानों को भी एक सशक्त सुरक्षा कवच प्रदान करेगी।

उन्होंने कहा कि इस प्रणाली को आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता के साथ विकसित किया जा रहा है। इसकी त्रि-स्तरीय सुरक्षा संरचना नागरिकों को न्यूनतम असुविधा पहुंचाते हुए उनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। श्री सिंह ने मिशन सुदर्शन चक्र का उद्देश्य देश की अत्यंत महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों को समग्र और विश्वसनीय सुरक्षा प्रदान करना है।

रक्षा मंत्री ने युद्ध के बदलते स्वरूप और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए ‘लचीलेपन’ व ‘प्रतिरोध’ की क्षमता रखने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि एकीकृत वायु रक्षा प्रणालियां, हाइपरसोनिक हथियार, स्वायत्त प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रॉनिक युद्धक क्षमताएं और उन्नत सेंसर प्रौद्योगिकियां आधुनिक युद्ध के स्वरूप को तेजी से बदल रही हैं। श्री सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तनाव एवं बदलाव के दौर से गुज़र रही है; जहां पुरानी धारणाएं टूट रही हैं और नए गठबंधन व चुनौतियां आकार ले रही हैं। ऐसे माहौल में, ‘लचीलेपन’ – यानी किसी भी झटके को सहकर फिर से उबरने की क्षमता व ‘प्रतिरोध’ की आवश्यकता है, यानी हमलावर के मन में यह डर पैदा करने की क्षमता कि अगर कोई बुरी नजर डाली गई तो मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

श्री राजनाथ सिंह ने देश की ‘लचीलेपन’ व ‘प्रतिरोध’ की क्षमताओं को बढ़ाने में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के प्रयासों को सराहते हुए कहा कि यह संगठन देश में यह भरोसा बढ़ा रहा है कि वह न तो अस्थिरता के आगे झुकेगा और न ही अपनी तैयारियों में कोई कमी आने देगा। उन्होंने कहा, “आज का शुभारंभ हर चुनौती से निपटने के लिए सतर्क, सक्षम और आत्मनिर्भर बनने के हमारे संकल्प का प्रतीक है।”

रक्षा मंत्री ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की लगातार कोशिशों की प्रशंसा की, जिनके माध्यम से वे आज की चुनौतियों का सामना करते हुए ऐसी भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम कर रहे हैं जो भारत को रणनीतिक बढ़त दिलाती हैं। उन्होंने कहा, “रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की जिम्मेदारी केवल प्रौद्योगिकियों में होने वाले बदलावों को अपनाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की जरूरतों का अंदाजा लगाना भी है। श्री सिंह ने कहा कि पूरे भरोसे के साथ इस चुनौती को स्वीकार किया गया है। हाल के वर्षों में, उसने स्वदेशी मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई अहम उपलब्धियां हासिल की हैं। अत्याधुनिक मिसाइल प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है और रणनीतिक व सामरिक हथियार कार्यक्रमों में लगातार प्रगति हो रही है। उन्होंने कहा कि ये उपलब्धियां मात्र प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में मील का पत्थर नहीं हैं; ये भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास एवं रणनीतिक क्षमताओं को भी दर्शाती हैं।

श्री राजनाथ सिंह ने भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए रक्षा बलों को सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में अत्याधुनिक प्रणालियों से लैस करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि युद्ध में जीत मात्र तकनीकी श्रेष्ठता से ही पक्की नहीं होती; बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। रक्षा मंत्री रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, सेनाओं और रक्षा उद्योग जगत से एक एकीकृत रक्षा प्रणाली के तौर पर काम करने का आह्वान किया, ताकि प्रौद्योगिकी को विकास से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक तेजiसे ले जाया जा सके और उन्हें समय पर शामिल करना सुनिश्चित किया जा सके।

रक्षा मंत्री ने डीआरडीओ से उत्पादन को अनुसंधान एवं विकास प्रक्रिया का अभिन्न अंग मानने का आग्रह किया। उन्होंने विकास से उत्पादन तक की समयावधि को कम करने, विनिर्माण प्रक्रियाओं को सरल व दक्ष बनाने, स्वदेशी सामग्री के उपयोग को बढ़ावा देने तथा ऐसे रक्षा प्रणालियों के विकास पर विशेष बल दिया, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र बलों के लिए शीघ्रता से बड़े पैमाने पर निर्मित किया जा सके।

श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के स्वप्न को साकार करने के उद्देश्य से अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने इस दिशा में डीआरडीओ की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निजी उद्योगों, स्टार्ट-अप्स, एमएसएमई तथा शैक्षणिक संस्थानों के बीच बढ़े सहयोग ने देश के रक्षा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन लाया है। रक्षा मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि यह सहयोगात्मक मॉडल भारत को नवाचार से उत्पादन व उत्पादन से परिचालन क्षमता तक की यात्रा को और अधिक गति देने में सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने भरोसा जताया कि डीआरडीओ भविष्य में भी राष्ट्रीय क्षमताओं को सुदृढ़ करने, महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने तथा सशस्त्र बलों की परिचालन प्रभावशीलता को और मजबूत बनाने में अग्रणी भूमिका निभाता रहेगा।

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