!!”वंदे उत्कल जननी”!!

वंदे उत्कल जननी”!!
वंदे उत्कल जननी,
चारु हासमयी, चारु भावमयी,
जननी, जननी, जननी।।
पूत-पयोधि-विधौत-शरीरा,
ताल तमाल सुशोभित-तीरा,
शुभ्र-तटिनी-कूल-शीत-समीरा,
जननी, जननी, जननी।।
घन-घन-वन-भूमि रचित-अंगे,
नील भूधर-माला साजे तरंगे,
कल-कल मुखरित चारु विहंगे,
जननी, जननी, जननी।।
सुंदर शाल सुशोभित-क्षेत्रा,
योगि ऋषिगण उटज पवित्रा,
सुंदर-मंदिर-मंडित देशा,
चारु-कलावती-शोभित-वेशा,
पुण्य तीर्थमय पूर्ण प्रदेशा,
जननी, जननी, जननी।।
कविकुल मेल-सुनंदन-वंद्या,
भुवन-विघोषित-कीर्ति-अनिंद्या,
धन्ये-पुण्य, चिरशरणये,
जननी, जननी, जननी।।

उत्कल दिवस के उपलक्ष्य पर “टेक्सटाइल मर्चेंट एसोसिएशन” के सभी सदस्यों को “सत्र:-25-27” कमिटी की तरफ से बहुत-बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं…
🙏

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