बोइता बंदना : स्मृतियों की नाव

उतरती है कार्तिक पूर्णिमा
ज्यों ओडिशा के आँगन में
प्रज्वलित हो उठा दीप समय का…

हवा में घुली है नमी महानदी की
झिलमिलाती लहरें सुबह की आरती-सी
बुला रही हैं उन नावों को
जो कभी लौट आई थीं
इतिहास के किनारों से…

केले के तनों, कागज़ की पालों पर
लिखी जाती है कविता लोक-श्रद्धा की
दीपक, फूल, पान-सुपारी, सिक्के
सब मिलकर बन जाते हैं
प्रतीक स्मरण की भाषा के…

*डंगा भसानि* के समय
हर लहर के संग बहती है वही कामना
कि फिर कोई साधबा उठे
फिर कोई कलिंग जगे
अपने साहस के साथ…

नदियों में प्रवाहित होती छोटी-छोटी नौकाएँ
जैसे प्रार्थनाएँ बनकर तैरती हैं
बाली, जावा, सुमात्रा की दिशाओं में
जहाँ हमारे पूर्वजों की पुकारें
अब भी गूँजती हैं
समुद्र की गहराइयों में…

यह *बोइता बंदना*
उत्सव नहीं केवल नावों का
यह दीपोत्सव है स्मृति का…

जहाँ कहानी है हर एक नाव ?
हर लहर है एक संस्कार
और हर प्रवाह
अतीत को प्रणाम करता हुआ
बहता है भविष्य की ओर…!!

बोइत बंदना – नाव की पूजा
डंगा भसानि – नौका को नदी में प्रवाहित करना

पुष्पा सिंघी, कटक
5 नवम्बर 2025 (कार्तिक पूर्णिमा)

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