लक्ष्मी निवास मित्तल की स्टील किंग बनने की कहानी- इंजीनियर श्याम सुंदर पोद्दार बी. ई. ई ., एम.बी.ए. चेयरमैन, सीताराम पोद्दार ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़

स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल आज सबके लिए एक पहेली है। टाटा ने बड़ा बनने के लिए उनकी नकल करते हुए ब्रिटेन की एक कंपनी का अधिग्रहण किया। पर टाटा ग्रुप को इस अधिग्रहण से बहुत हानि हुई। उसी तरह कुमार मंगलम बिरला ने एल्युमीनियम कंपनी का अधिग्रहण कर अपना हाथ जलाया।
लक्ष्मी निवास मित्तल के पिता श्री मोहन लाल मित्तल ने आंध्र स्टील कारपोरेशन बनाई। पर उनके भाइयो ने उन्हें कंपनी से निकाल दिया। क्योंकि उनके पास मेजोरिटी थी। इसी कारखाने में लक्ष्मी निवास मित्तल का प्रशिक्षण हुआ। उनके ससुर ने उन्हें इंडोनेशिया में एक बीमार लोहे का कारखाना दिलवा दिया नाम था, जिसका नाम पीटी इस्पात इंडो था।
लक्ष्मी निवास मित्तल ने इस कार खाने को बीमारी से निकाल कर स्वस्थ बनाया तथा बीमार स्टील कारखाने को स्वस्थ बनाने का डॉक्टर बन गया। लक्ष्मी निवास मित्तल ने १५००० करोड़ लागत का कारखाना १५०० करोड में खरीदा। डाउन पेमेंट के १५० करोड़ में से भी उसके पास सिर्फ ७० करोड़ थे। ८० करोड़ बैंक से लिया। दस वर्ष में उसे १५०० करोड़ रूपये अदा करना था। उसने सबसे पहले यह जानने का प्रयत्न किया कि कंपनी की बीमारी का कारण क्या है। कंपनी की मशीनें अपनी ६० प्रतिशत कैपेसिटी पर चल रही थी। यानी यदि १०० प्रतिशत पर चलाए और नया मार्केट बना ले, तो कंपनी स्वास्थ हो जाएगी।
यही काम उसने किया। कंपनी में पैकिंग किया हुआ नया प्लांट रखा था। उसने उसे बेच दिया और अच्छा पैसा उठाकर बैंक का पैसा चुका दिया और कारखाना चलाने के लिए पूजी मिल गई। यह कारखाना रिवाइव हो गया। उनके अधिग्रहण से यह शिक्षा मिलती है कि कोई बीमार कंपनी लेनी हो, तो १० प्रतिशत से अधिक क़ीमत में नहीं लेनी चाहिए। बीमारी का कारण समझना चाहिए, तब लेना चाहिए।

काम करने के लिए भारत के पब्लिक सेक्टर के अधिकारियों को काम में लगा देना चाहिए। उन्होंने उजबेगिस्तान का प्लांट इससे भी सस्ता ख़रीदा। विश्व का कोई भी बिडर इसको लेना नहीं चाहता था। सिर्फ़ उन्होंने ही बोली लगाई। यह कारख़ाना उज़बेगिस्तान में था व इसका उत्पन्न माल मास्को में बिकता था, जो राजनीति कारणों से संभव नहीं था। इन्होंने इसका अधिग्रहण इसलिए किया कि इस प्लांट के २०० किलो मीटर पर चाइना था। वहाँ ओलंपिक होने थे। उन्हें स्टील की बहुत आवश्यकता थी। भारत के नाल्को के अधिकारी मिश्रा जी को उन्होंने इसे चलाने का दायित्व दिया।

अब इन्होंने अपना हेड क्वाटर इंडोनेशिया से लंदन कर लिया। ३० प्रति शत फ्रांस की आर्सेलर कंपनी का हिस्सा लेकर कठिन लड़ाई लड़ा कर अधिग्रहण करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार विश्व का स्टील किंग बन गया।

कुछ दिन पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आरपीजी ग्रुप के हर्ष गोयनका का लेख था। उन्होंने लिखा कि गुजराती प्रतिभा के सामने आज भी मारवाड़ी उद्योगपति उभर रहे हैं। उन्होंने इमामी का उदाहरण दिया। धीरू भाई अंबानी को सम्मान के साथ लिख रहा हूँ। इन्होंने ग़ज़ब की ऊंचाइयों को छुआ। पर ल एंड टी को ले नहीं सका। वही मारवाड़ी युवक लक्ष्मी निवास मित्तल ने आर्सेलर कंपनी ले सफलता पूर्वक अधिग्रहण कर बिश्व का स्टील किंग बन गया। आने वाले दिनों में और भी मारवाड़ी युवक आगे आयेंगे और दुनिया देखेगी।

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