आज है राष्ट्रीय एकता दिवस
और स्मृति के द्वार पर
जैसे इतिहास फिर से दे रहा दस्तक…
खुल रही है धीरे-धीरे वह सुबह,
जब मैं पहुँची थी ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के निकट
देखी नर्मदा की बाँहों में लिपटी
एक विराट आकृति को निहारते हुए
जो केवल मूर्ति नहीं
मानो शिखर थी पुरुषार्थ का…
देखती रही मैं
धरती से आकाश तक उठती
उस लौह मूर्ति की देह
और मन में कौंधा –
“जिसका प्रतिरूप इतना विशाल है,
उसका व्यक्तित्व कितना बड़ा रहा होगा।”
गूँजता था इतिहास चारों ओर
पाँच सौ रियासतों के विखंडन से
एक राष्ट्र का एकत्व गढ़ने वाला हाथ
जिसने ‘भारत’ शब्द को
अखंड अर्थ दिया था आजादी के बाद…
नीचे, शिलालेखों में उकेरी गई
उनकी जीवनगाथा पढ़ती रही
और जब लिफ़्ट से पहुँची ऊपर
मूर्ति के हृदय तक
यूंँ लगा कि मैं देख रही हूँ वही स्वप्न
नीचे फैली हरित धरा
नीली नर्मदा का नयनाभिराम विस्तार
मन में उमड़ी मौन कृतज्ञता –
“हे सरदार,
तुम्हारे ही पुरुषार्थ का विस्तार है यह दृश्य।”
ढलने लगी थी साँझ
लाइट एंड साउंड शो में
फैल गया उजास उनके कर्मठ जीवन का
जो चीरता जा रहा था अंधकार को
और हर किरण कह रही थी –
“जहाँ लौह है, वहाँ चेतना भी है।”
हे सरदार !
नमन है तुम्हें
तुम्हारे दृढ़ मनोबल को,
सूझ-बूझ और संकल्प शक्ति को
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
खड़ा है जो अखंड भारत
उसकी हर ईंट में
गूँजता है राग तुम्हारे श्रम का…
हे मनस्वी !
तुम देह से दूर सही
पर इस मिट्टी के हर कण में बसे हो,
धड़कते हो हर देशवासी के हृदय में…
हे लौह पुरुष !
देखो, फिर उठ खड़ा हुआ है तुम्हारा भारत
विकास की पगडंडियों पर
अनेकता में एकता की रागिनी गुँजाता हुआ…
आओ, फिर एक बार
और स्पर्श करो इस पावन माटी को
हमारी श्रद्धा बनकर
हमारे साहस का प्रतीक बनकर…!!
पुष्पा सिंघी, कटक
31 अक्टूबर 2025

