अक्षय तृतीया का त्यौहार वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि पर मनाया जाता है । अक्षय तृतीया को उत्तर भारत में ‘आखा तीज’ भी कहते है । अक्षय तृतीया की तिथि साढेतीन मूहूर्तों में से एक पूर्ण मुहूर्त है । इस दिन सत्ययुग समाप्त होकर त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ, ऐसा माना जाता है । इस कारण से यह एक संधिकाल है । मुहूर्त कुछ ही क्षणों का होता है; परंतु अक्षय तृतीया संधिकाल होने से उसका परिणाम २४ घंटे तक रहता है । इसलिए यह पूरा दिन ही अच्छे कार्यों के लिए शुभ माना जाता है ।
*अक्षय तृतीया का महत्त्व*
अक्षय तृतीया के दिन ही हयग्रीव, परशुराम और नर नारायण जैसे भगवान के अवतार हुए थे। अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्मा एवं श्री विष्णु इन दो देवताओं की सम्मिलित लहरे पृथ्वी पर आती है, जिससे पृथ्वी की सात्विकता दस प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इस सात्विकता का लाभ लेने के लिए इस दिन स्नान, ध्यान, दान, भगवत पूजन, जपतप, हवन और पितृ तर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। अक्षय अर्थात जिसका कभी क्षय नही होता है। माना जाता है कि इस दिन जो भी पुण्य कर्म अर्जित किये जाते हैं, उनका क्षय नही होता है। यही कारण है कि इस दिन शुभ विवाह, गृह प्रवेश, वस्त्र-आभूषण क्रय करना आदि शुभ कार्य भी बिना मुहूर्त देखे किए जा सकते हैं । क्योंकि इस दिन की संपूर्ण अवधि ही शुभ मुहूर्त होती है। इस दिन नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था आदि की स्थापना अथवा उद्घाटन का कार्य शुभ एवं श्रेष्ट माना जाता है । इस दिन के गंगा स्नान तथा भगवत पूजन से पाप नष्ट होते हैं ।
*अक्षय तृतीया के दिन दान देने का महत्त्व*
हिन्दू धर्म बताता है, ‘सत्पात्र दान करना, प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है ।’ सत्पात्र दान का अर्थ सत् याने ईश्वर के कार्य हेतु दान धर्म करना।अर्थात धार्मिक कार्य करने वाले व्यक्ति तथा समाज में धर्म प्रसार करने वाली आध्यात्मिक संस्थाओं को दान करना चाहिए। कालानुरूप यही सत्पात्र दान है। अक्षय तृतीया के दिन गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद और कन्यादान करने का महत्व है। इस दिन जितना भी दान करते हैं उसका बहुत अधिक फल प्राप्त होता है। यही कारण है, इस दिन पुण्य प्राप्त करने का महत्व बहुत अधिक है। दान देने से मनुष्य का पुण्यबल बढता है, तो ‘सत्पात्र दान’ देने से पुण्य संचय सहित व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है ।
*अक्षय तृतीया के दिन ये अवश्य करें !*
पवित्र जल में स्नान करें । हो सके तो तीर्थक्षेत्र जाकर स्नान करें अन्यथा बहते पानी में स्नान करें । किसी कारणवश यह संभव नहीं है, तो घर में स्नान करते समय हम पवित्र नदियों के जल से ही स्नान कर रहे हैं, यह भाव रखकर जाप करें। तिलतर्पण करें ! तिल-तर्पण का अर्थ है, देवताओं एवं पूर्वजों को तिल एवं जल अर्पण करना । तर्पण का अर्थ है, देवता एवं पूर्वजों को जलांजलि; अर्थात अंजुली से जल देकर उन्हें तृप्त करना । पितरों के लिए दिया हुआ जल ही पितृतर्पण कहलाता है । पूर्वजों को अपने वंशजों से पिंड एवं ब्राह्मणभोजन की अपेक्षा रहती है, उसी प्रकार उन्हें जल की भी अपेक्षा रहती है । तर्पण करने से पितर संतुष्ट होते हैं । तिल सात्त्विकता का, तो जल शुद्ध भाव का प्रतीक है । देवताओं को श्वेत एवं पूर्वजों को काले तिल अर्पण करते हैं । काले तिल द्वारा प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगों की सहायता से पृथ्वी पर अतृप्त लिंगदेह उनके लिए की जा रही विधि के स्थान पर सहज ही आ सकते हैं एवं सहजता से अपना अंश ग्रहण कर तृप्त होते हैं ।
इस दिन सातत्य से सुख-समृद्धि देनेवाले देवताओं के प्रति कृतज्ञता भाव रखकर उनकी उपासना करने से हम पर उन देवताओं की होनेवाली कृपा का कभी भी क्षय नहीं होता । इस दिन कृतज्ञता भाव से श्रीविष्णु सहित वैभवलक्ष्मी की प्रतिमा का पूजन करें तथा होमहवन एवं जप-जाप करने में समय व्यतीत करें ।

