# कविता आ जाओ ना #
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द्वार खुला है
कविता आ जाओ ना !
मेरा यह वादा है
तुमको जतन से रखूँगी
खूब सजाऊँगी-संवारूँगी
ललाट पर
सत्य का टीका लगाऊँगी
आद्र नयनों में
संवेदना का काजल आँजूँगी
अधरों पर
मृदुल लाली लगाऊँगी
वदन पर
चिन्तन का पाउडर पोतूँगी
श्यामल केशों में
महकते आखरों का गजरा होगा
हथेलियों में
सुन्दर सुर्ख मेहँन्दी रचाऊँगी
आभूषणों में
सूरज-चाँद-तारे झिलमिलायेंगे
युगधर्मिणी !
नव-ग्रह मंगल गीत गायेंगे
कवि कुटीर में –
सामाजिक विसंगतियाँ
तुमको कभी बाँध न पायेंगी
सड़ी-गली रूढ़ियाँ
शब्द-झाड़ू से बुहार दी जायेंगी
उन्मुक्त हवाएँ
हौले-हौले बदन को सहलायेंगी
उजली पोशाक
समग्र जगती को जगमगायेगी
मेरी साँसें
तुम्हारी साँसों से जुड़ जायेंगी
वेद ऋचा-सी
मैं कोरे पन्नों में ढल जाऊँगी
सच , मैं कहती हूँ ना !
द्वार खुला है
कविता आ जाओ ना !
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पुष्पा सिंघी , कटक
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