श्रीजगन्नाथ पुरी समाचार : आज पुरी में है प्रसिद्ध हेरापंचमी

नन्द किशोर जोशी

आषाढ़ महीने की शुक्लपक्ष षष्ठी तिथि में हेरापंचमी पर माता महालक्ष्मी श्रीगुंडिचा मंदिर में महाप्रभु जगन्नाथ के निकट आती है.जगन्नाथजी रथयात्रा पर माता महालक्ष्मीजी को साथ में नहीं लाये ,इससे नाराज होकर माता महालक्ष्मी ने जगन्नाथजी के रथ नंदीघोष को नुकसान पहुंचाया तथा रथ को थोडा सा तोडा.

महालक्ष्मी रथ को थोडा नुकसान पहुंचा कर वापस श्रीमंदिर चली गयी.श्रीमंदिर होता है महाप्रभु जगन्नाथजी का घर.उसी घर में महाप्रभु रहते हैं बडे भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा तथा पत्नी लक्ष्मी के साथ.

सभी घरों में जैसे आयेदिन कलह,झगडे होते रहते हैं,वैसे ही महाप्रभु के घर में भी कभी कभार कलह होजाती है,फिर उस कलह को खत्म करने के लिए सुंदर समाधान भी निकल आता है.प्रसिद्ध ओडिआ साहित्यकार बलराम दास के ‘लक्ष्मी पुराण’ में इस विषय को लेकर सुन्दर वर्णन किया गया है.

महाप्रभु जगन्नाथ की शादी होती है रुक्मिणी(श्रीदेवी या लक्ष्मी) के साथ.इस विवाह के 3 दिन पश्चात आती है ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा. उसी पूर्णिमा के दिन श्रीजगन्नाथजी का जन्म दिन भी है.

उसी पूर्णिमा के दिन वे भाई और बहन के साथ भक्तों के बीच में आते हैं,खूब स्नान करते हैं , फिर
बीमार पडजाते हैं .इसी दिन को स्नानपूर्णिमा भी कहते हैं.

बीमारी हालात में महाप्रभु चिकित्साधीन रहते हैं.पंद्रह दिन पश्चात वे स्वस्थ होते हैं,नवयौवन दर्शन देते हैं भक्तों को.तत्पश्चात वे रथयात्रा के दिन रथों पर सवार होकर चले जाते हैं श्रीगुंडिचा मंदिर अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम अनुसार.

इनसब के बीच विवाह पश्चात भी लक्ष्मीजी के साथ वाला गठजोडा अभी तक खोला नहीं गया, महाप्रभु एकांतवास में महालक्ष्मी जी के साथ एकदिन भी नहीं रहे.

इनसारी बातों के मद्देनजर माता महालक्ष्मी जगन्नाथजी से नाराज होती हैं,क्रोधित अवस्था में पालकी में बैठकर गाजेबाजे के साथ तमतमाती हुई लक्ष्मीजी श्रीगुंडिचा मंदिर पहुंची महाप्रभु के पास,बडी चौडी सडक से उनका आना हुआ पालकी में बैठकर.

महाप्रभु को एक झलक माता लक्ष्मी ने देखा, महाप्रभु समझ गये देवी नाराज हैं,महाप्रभु ने आज्ञामाल भेजा महालक्ष्मीजी के पास.

महालक्ष्मीजी ने जीभरकर नहीं देखा महाप्रभु को ,असंतुष्ट हुई,श्रीजगन्नाथ के नंदीघोष रथपर ,उन्होंने गुस्सा निकाला, रथ को थोडा नुकसान पहुंचायी.वापस श्रीमंदिर जाने लगी.

महालक्ष्मी को रथ के नुकसान पहुंचाने के कारण मन में ग्लानि हुई.वे श्रीमंदिर वापस चौडे रास्ते से यानि मुख्य सडक से नहीं जाकर,गली का सहारा ली ,वो भी चुपचाप बिना गाजेबाजे के.

महालक्ष्मी श्रीमंदिर चली आयी.महाप्रभु के आने का इंतजार करती रही.महाप्रभु बाहुडा में वापस श्रीमंदिर का रुख किये.

रास्ते पर राजा के घर के पास थोडी देर रुके.राजा ने महाप्रभु के साथ महालक्ष्मी की भेंट करायी.अधरपणा प्रसाद के पश्चात महाप्रभु श्रीमंदिर में प्रवेश किये.वहाँ महालक्ष्मी को खुश करने के लिए उसदिन रसगुल्लों का प्रसाद लगाया जाता है,महालक्ष्मी रसगुल्ले प्रसाद से खुश होजाती हैं,झगडा खत्म होजाता है.

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